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फर्जी बैगा बनकर सरकारी नौकरी?”GPM में जाति प्रमाण पत्र घोटाले का बड़ा विस्फोट, 55 लोग रडार पर… बैगा समाज बोला- “हमारा हक खा गए बाहरी लोग”

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गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। छत्तीसगढ़ के गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में फर्जी जाति प्रमाण पत्र के जरिए सरकारी नौकरी हासिल करने के कथित खेल ने अब बड़ा सामाजिक और प्रशासनिक विवाद खड़ा कर दिया है। विशेष पिछड़ी जनजाति ‘बैगा’ के नाम पर वर्षों से चल रहे कथित फर्जीवाड़े के खिलाफ मंगलवार को बैगा समाज खुलकर सड़कों पर उतर आया। बड़ी संख्या में समाज के लोग कलेक्ट्रेट पहुंचे और प्रशासन को ज्ञापन सौंपते हुए राज्य स्तरीय जांच की मांग कर डाली।

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मामले की अगुवाई अखिल भारतीय आदिवासी कांग्रेस की राष्ट्रीय समन्वयक अर्चना पोर्ते और ‘नांगा बैगा जनशक्ति संगठन’ के पदाधिकारियों ने की। ज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि बिलासपुर जिले के ग्राम पोड़ी थाना सीपत क्षेत्र सहित अन्य इलाकों के लगभग 55 लोगों ने कथित रूप सेपूर्व मे जिला बिलासपुर एवं वर्तमान में जिला गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही से फर्जी दस्तावेज, गलत वंशावली और कूटरचित रिकॉर्ड के आधार पर खुद को बैगा जनजाति का सदस्य बताकर जाति प्रमाण पत्र बनवा लिया। आरोप है कि इन्हीं प्रमाण पत्रों के आधार पर सरकारी विभागों में नौकरियां भी हासिल की गईं।

बैगा समाज के प्रतिनिधियों ने मीडिया से चर्चा में दावा किया कि यह सिर्फ 55 लोगों का मामला नहीं है, बल्कि पूरे प्रदेश में फैले बड़े “जाति प्रमाण पत्र रैकेट” का हिस्सा हो सकता है। समाज का आरोप है कि यदि गहराई से जांच की जाए तो फर्जी नियुक्तियों की संख्या 150 से 200 तक पहुंच सकती है।

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समाज के पदाधिकारियों ने आरोप लगाया कि जिन लोगों पर संदेह है, वे वर्तमान में शिक्षा विभाग, स्वास्थ्य विभाग, कृषि विभाग, हाईकोर्ट, BSF, आर्मी और अन्य सरकारी संस्थानों में पदस्थ हैं। बैगा समाज का कहना है कि विशेष पिछड़ी जनजाति वर्ग के लिए सरकार ने जो विशेष प्रावधान बनाए थे, उनका खुलेआम दुरुपयोग किया गया।

समाज का आरोप है कि बैगा जनजाति को सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर मानते हुए सरकार ने तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के पदों में विशेष भर्ती और आरक्षण की सुविधा दी थी, ताकि बैगा समुदाय के युवाओं को मुख्यधारा में लाया जा सके। लेकिन कथित तौर पर प्रभावशाली और गैर-आदिवासी पृष्ठभूमि के लोगों ने फर्जी दस्तावेज तैयार कर इस व्यवस्था में सेंध लगा दी।

“न रोटी-बेटी का संबंध, न समाज से कोई जुड़ाव”

बैगा समाज के नेताओं ने कहा कि जिन लोगों ने बैगा प्रमाण पत्र बनवाए हैं, उनका न तो बैगा समाज से कोई सामाजिक रिश्ता है, न रोटी-बेटी का संबंध और न ही वे कभी बैगा बाहुल्य गांवों में रहे। इसके बावजूद प्रमाण पत्र जारी होना कई अधिकारियों की भूमिका पर सवाल खड़े करता है।

समाज ने आरोप लगाया कि जाति प्रमाण पत्र जारी करते समय न तो सही वंशावली की जांच की गई और न ही पुराने राजस्व रिकॉर्ड, मिसल और सामाजिक सत्यापन को गंभीरता से देखा गया। समाज के लोगों ने सीधे तौर पर तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों और एसडीएम की भूमिका की जांच की मांग की है।

“अगर जांच हुई तो कई बड़े नाम सामने आएंगे”

ज्ञापन सौंपने के बाद समाज के प्रतिनिधियों ने दावा किया कि मामले में कई रसूखदार परिवारों के नाम सामने आ सकते हैं। उनका कहना है कि कुछ परिवार वर्षों से फर्जी प्रमाण पत्र के सहारे नौकरी, प्रमोशन और सरकारी लाभ लेते रहे हैं। यदि परिवारवार जांच हो, तो कई चौंकाने वाले खुलासे हो सकते हैं। समाज ने यह भी आरोप लगाया कि असली बैगा युवाओं को नौकरी नहीं मिल पा रही, जबकि फर्जी प्रमाण पत्रधारी सरकारी सिस्टम में वर्षों से जमे हुए हैं। इससे समाज में भारी नाराजगी और असंतोष पैदा हो रहा है।

राज्य स्तरीय जांच और कार्रवाई की मांग

बैगा समाज ने मांग की है कि पूरे मामले की जांच राज्य स्तरीय जाति सत्यापन छानबीन समिति से कराई जाए। साथ ही जिन अधिकारियों ने कथित तौर पर बिना सत्यापन के प्रमाण पत्र जारी किए, उनकी जिम्मेदारी भी तय की जाए। समाज ने फर्जी प्रमाण पत्र निरस्त करने, सरकारी नौकरी समाप्त करने और आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग भी उठाई है।

कलेक्टर ने दिया जांच का आश्वासन

कलेक्ट्रेट पहुंचे प्रतिनिधिमंडल को प्रशासन की ओर से मामले की जांच का आश्वासन दिया गया है। हालांकि समाज का कहना है कि केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जल्द निष्पक्ष जांच शुरू नहीं हुई तो आंदोलन को जिला स्तर से प्रदेश स्तर तक ले जाया जाएगा। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वर्षों से सरकारी सिस्टम में कथित रूप से “फर्जी बैगा” बनकर नौकरी कर रहे लोगों पर कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी फाइलों और जांच समितियों में उलझकर रह जाएगा।

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