गौरेला पेंड्रा मरवाही -DMF में करोड़ों का कथित कमीशन नेटवर्क! कितना पैसा किसे मिला? तत्कालीन कलेक्टर लीना के करीबी बताए जा रहे अजीत डिक्सेना की भूमिका पर उठे सवाल, सूत्रों ने बताया मुख्य डीलर!?

GPM में 17.47 करोड़ रुपये के 160 DMF कार्यों की स्वीकृति, 8.32 करोड़ रुपये के चेक और समिति की मंजूरी के बिना कार्य स्वीकृत किए जाने का मामला। अब सूत्रों के हवाले से DMF शाखा में पदस्थ अजीत डिक्सेना की भूमिका को लेकर सवाल उठ रहे हैं। कथित 15 प्रतिशत कमीशन के 10-3-2 के गणित की चर्चा—10 प्रतिशत कलेक्टर, 3 प्रतिशत डिप्टी कलेक्टर और 2 प्रतिशत शाखा कर्मचारी के नाम पर बताए जा रहे हैं। सवाल है कि क्या अजीत डिक्सेना इस कथित नेटवर्क में मुख्य समन्वयकर्ता थे? किससे रकम ली गई और किस तक पहुंचाई गई?
रायपुर/GPM | विशेष पड़ताल
छत्तीसगढ़ में DMF यानी जिला खनिज न्यास की राशि को लेकर कोरबा से लेकर गौरेला-पेंड्रा-मरवाही तक सामने आए मामलों ने सरकारी व्यवस्था की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कोरबा DMF घोटाले में ACB की जांच रिपोर्ट के हवाले से तत्कालीन कलेक्टर रानू साहू को लगभग 57.85 करोड़ रुपये की अवैध राशि मिलने का दावा सामने आया था। जांच में टेंडर राशि का 40 प्रतिशत तक कमीशन दिए जाने और DMF के नियमों में कथित बदलाव कर कमीशनखोरी का रास्ता आसान बनाने के आरोप भी सामने आए।

अब GPM जिले में 17.47 करोड़ रुपये के 160 DMF कार्यों की स्वीकृति और लगभग 8.32 करोड़ रुपये के चेक जारी होने का मामला चर्चा में है। इस प्रकरण में स्थानीय स्तर पर कथित 15 प्रतिशत कमीशन की चर्चा के साथ अब DMF शाखा में पदस्थ अजीत डिक्सेना की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
कलेक्टर के करीबी बताए जा रहे अजीत डिक्सेना, क्या थे मुख्य डीलर?

सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि तत्कालीन प्रशासनिक व्यवस्था में DMF शाखा में पदस्थ अजीत डिक्सेना की भूमिका केवल कार्यालयीन कामकाज तक सीमित नहीं थी, बल्कि वे कथित तौर पर कार्यों की स्वीकृति, एजेंसियों और संबंधित लोगों के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण कड़ी थे। कुछ सूत्र उन्हें इस पूरे कथित कमीशन नेटवर्क का मुख्य डीलर बता रहे हैं।
हालांकि, अजीत डिक्सेना द्वारा कमीशन लेने, किसी अधिकारी तक रकम पहुंचाने या किसी ठेकेदार से अवैध भुगतान कराने का कोई स्वतंत्र दस्तावेजी प्रमाण फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसलिए उनकी भूमिका की पुष्टि दस्तावेजों, भुगतान रिकॉर्ड और संबंधित लोगों के बयान से होना जरूरी है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि DMF शाखा में उनकी वास्तविक जिम्मेदारी क्या थी? किन फाइलों पर उनकी नोटशीट या अनुशंसा थी? किन कार्यों की स्वीकृति और भुगतान की प्रक्रिया में वे शामिल रहे? क्या ठेकेदारों और कार्यकारी एजेंसियों से उनका सीधा संपर्क था? इन सभी पहलुओं की जांच से ही उनकी भूमिका स्पष्ट हो सकेगी।
15 प्रतिशत कमीशन का कथित गणित: किसके हिस्से कितनी रकम?
स्थानीय स्तर पर सामने आ रही चर्चाओं के अनुसार कथित कमीशन का गणित 10-3-2 प्रतिशत बताया जा रहा है। इसमें 10 प्रतिशत तत्कालीन कलेक्टर, 3 प्रतिशत डिप्टी कलेक्टर और 2 प्रतिशत DMF शाखा के कर्मचारी के हिस्से के रूप में बताए जा रहे हैं।
यदि यह कथित अनुपात 17.47 करोड़ रुपये की पूरी स्वीकृत राशि पर लागू माना जाए, तो गणित इस प्रकार होगा—
* 10 प्रतिशत: लगभग 1 करोड़ 74 लाख 70 हजार रुपये।
* 3 प्रतिशत: लगभग 52 लाख 41 हजार रुपये।
* 2 प्रतिशत: लगभग 34 लाख 94 हजार रुपये।
* कुल 15 प्रतिशत: लगभग 2 करोड़ 62 लाख 5 हजार रुपये।
लेकिन यह केवल स्वीकृत राशि पर आधारित गणितीय उदाहरण है। इसे वास्तविक कमीशन, रिश्वत या किसी व्यक्ति को मिली रकम नहीं माना जा सकता। वास्तविक गणना के लिए यह जानना जरूरी होगा कि कथित प्रतिशत किस आधार पर तय था—स्वीकृत राशि, जारी चेक, वास्तविक भुगतान या ठेकेदार को प्राप्त रकम। फिलहाल इस 10-3-2 के कथित बंटवारे की स्वतंत्र पुष्टि भी नहीं हुई है।
17.47 करोड़ की स्वीकृति, 8.32 करोड़ के चेक—फाइल किसने आगे बढ़ाई?
GPM में 160 कार्यों के लिए लगभग 17 करोड़ 47 लाख रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति और करीब 8 करोड़ 32 लाख रुपये के चेक जारी होने का मामला प्रशासनिक जांच के दायरे में है। 21 अक्टूबर 2026 के कलेक्टर कार्यालय के पत्र में प्रबंधकारिणी समिति और शासी परिषद के अनुमोदन के बिना कार्य स्वीकृत किए जाने का उल्लेख सामने आया है।
ऐसे में जांच का सबसे अहम बिंदु यह होना चाहिए कि प्रस्ताव किसने तैयार किए, फाइल किस-किस अधिकारी और कर्मचारी के पास गई, तकनीकी परीक्षण किसने किया, प्रशासकीय स्वीकृति किसने दी और भुगतान के चेक किसके हस्ताक्षर से जारी हुए।
यदि अजीत डिक्सेना की भूमिका इन फाइलों में थी, तो उनकी नोटशीट, पत्राचार, अनुशंसा और संबंधित एजेंसियों से संपर्क का रिकॉर्ड भी जांच में शामिल किया जाना चाहिए।
कोरबा की तरह GPM में भी कमीशन का नेटवर्क था?
कोरबा DMF मामले में जांच एजेंसियों ने कथित कमीशन भुगतान, बिचौलियों और ठेकेदारों के वित्तीय लेनदेन की पड़ताल की थी। वहां सामने आए आरोपों के आधार पर GPM में भी यह जांच जरूरी हो जाती है कि कहीं स्वीकृति और भुगतान की प्रक्रिया के आसपास कोई अनुचित आर्थिक लेनदेन तो नहीं हुआ।
क्या किसी ठेकेदार से काम दिलाने के बदले रकम मांगी गई? क्या भुगतान जारी होने के बाद किसी खाते से रकम निकाली गई या दूसरे खातों में स्थानांतरित की गई? क्या किसी कर्मचारी या बिचौलिए ने एजेंसियों और अधिकारियों के बीच संपर्क की भूमिका निभाई? क्या अजीत डिक्सेना के बैंक खातों, संपत्ति और संबंधित वित्तीय लेनदेन की जांच की आवश्यकता है?
इन सवालों का जवाब बिना वित्तीय जांच के नहीं मिल सकता। केवल चर्चा या सूत्रों के दावे को रिश्वत का प्रमाण नहीं माना जा सकता।
112 कार्य निरस्त, 7.09 करोड़ की वापसी का आदेश—अब जिम्मेदारी तय होगी?
दैनिक भास्कर की 2 नवंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व कलेक्टर के कार्यकाल में स्वीकृत 112 कार्यों की प्रशासकीय स्वीकृति निरस्त की गई। इन कार्यों की लागत 11 करोड़ 52 लाख 41 हजार 946 रुपये बताई गई है। संबंधित एजेंसियों को जारी 7 करोड़ 9 लाख 27 हजार 250 रुपये DMF खाते में वापस जमा कराने के निर्देश दिए गए हैं।
इससे पहले 29 अक्टूबर को 63 कार्य निरस्त किए जाने की जानकारी भी सामने आई थी। यह कार्रवाई स्वीकृति प्रक्रिया में गंभीर प्रशासनिक सवालों की ओर संकेत करती है। लेकिन अब केवल कार्य निरस्त करना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी जांचना होगा कि स्वीकृति और भुगतान की प्रक्रिया में किसकी क्या भूमिका थी और क्या किसी को अनुचित आर्थिक लाभ पहुंचाया गया।
अब जांच के केंद्र में ये सवाल
क्या अजीत डिक्सेना DMF शाखा में केवल कर्मचारी की भूमिका निभा रहे थे या कार्यों की स्वीकृति और भुगतान के बीच कोई अतिरिक्त समन्वय भी करते थे?
क्या ठेकेदारों और कार्यकारी एजेंसियों के बयान लेकर कथित 15 प्रतिशत कमीशन की चर्चा की जांच की जाएगी?
क्या 10-3-2 के कथित बंटवारे का कोई लिखित, डिजिटल या वित्तीय साक्ष्य मौजूद है?
क्या 17.47 करोड़ रुपये की स्वीकृति और 8.32 करोड़ रुपये के चेक से जुड़े सभी बैंक रिकॉर्ड की जांच होगी?
क्या तत्कालीन कलेक्टर, संबंधित डिप्टी कलेक्टर, DMF शाखा के कर्मचारियों और कार्यकारी एजेंसियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच होगी?
क्या अजीत डिक्सेना से इस पूरे मामले में उनकी भूमिका और कथित मुख्य डीलर बताए जाने के आरोपों पर जवाब लिया जाएगा?
सबसे बड़ा सवाल—DMF की 17.47 करोड़ रुपये की स्वीकृति के पीछे वास्तविक निर्णयकर्ता कौन थे, कथित कमीशन का पैसा किसने जुटाया, किसने बांटा और किसे कितना मिला?
खनन प्रभावित जनता के विकास के लिए आया DMF फंड किसी व्यक्ति या समूह की निजी कमाई का माध्यम नहीं बनना चाहिए। यदि कथित कमीशन नेटवर्क था, तो उसके हर किरदार की भूमिका सामने आनी चाहिए। शासन और जांच एजेंसियों को चाहिए कि फाइलों, बैंक खातों, भुगतान रिकॉर्ड, ठेकेदारों के बयान और संबंधित कर्मचारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच कराएं।
DMF का पैसा जनता का है। अब जनता सिर्फ स्वीकृति और निरस्तीकरण नहीं, बल्कि पूरे पैसे का हिसाब और जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही चाहती है।









