बिलासपुर- कानून की पढ़ाई का नहीं, शिक्षा घोटाले का कॉलेज बना डी.पी. विप्रा लॉ कॉलेज!___B.A. LL.B. प्रवेश प्रक्रिया में मेरिट सूची की कथित गड़बड़ी ने खड़े किए गंभीर सवाल; अधिक अंक वाले अभ्यर्थियों को दरकिनार कर कम अंक वालों को जगह देने का आरोप
राजनीतिक सिफारिश और आर्थिक लेन-देन की आशंका की भी जांच की मांग; पूरे प्रवेश सत्र के रिकॉर्ड खंगालने की उठी आवाज

बिलासपुर। कानून की शिक्षा देने वाले संस्थान में ही यदि प्रवेश प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता सवालों के घेरे में आ जाए, तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी? डी.पी. विप्रा लॉ कॉलेज में B.A. LL.B. प्रथम सेमेस्टर सत्र 2026-27 की प्रवेश प्रक्रिया को लेकर सामने आए आरोपों ने कॉलेज की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि प्रवेश के दौरान मेरिट के निर्धारित मानकों का पालन नहीं किया गया और अधिक अंक प्राप्त करने वाले पात्र अभ्यर्थियों को दरकिनार कर उनसे कम अंक वाले अभ्यर्थियों को सूची में स्थान दिया गया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर कॉलेज में प्रवेश का आधार योग्यता और मेरिट है या फिर किसी का प्रभाव और सिफारिश?
मेरिट सूची में कथित गड़बड़ी, आखिर किस नियम से हुआ चयन?

शिकायतकर्ता के अनुसार, सामान्य वर्ग के अधिक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों के नाम चयन सूची से बाहर हैं, जबकि उनसे कम अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों के नाम सूची में शामिल हैं। उपलब्ध सूची में सामान्य वर्ग के कुछ अभ्यर्थियों के प्राप्तांक 58.40 प्रतिशत, 54.40 प्रतिशत, 52.80 प्रतिशत, 50.40 प्रतिशत और 48.80 प्रतिशत बताए गए हैं। वहीं इससे अधिक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी को चयन सूची में स्थान नहीं मिलने का आरोप है। यदि सभी अभ्यर्थी समान श्रेणी और समान पात्रता मानदंड के अंतर्गत आते हैं, तो कॉलेज प्रबंधन को स्पष्ट करना चाहिए कि कम अंक वाले अभ्यर्थियों को किस आधार पर चयनित किया गया और अधिक अंक वाले पात्र अभ्यर्थियों को बाहर क्यों रखा गया?
क्या मेरिट पर भारी पड़ रही है राजनीतिक सिफारिश?

मामले में विभागाध्यक्ष संतोष ठाकुर की भूमिका को लेकर भी शिकायतकर्ता ने गंभीर आरोप लगाए हैं। शिकायतकर्ता का दावा है कि फोन पर हुई बातचीत के दौरान विभागाध्यक्ष ने प्रवेश प्रक्रिया में गलती होने की बात स्वीकार की थी। साथ ही कुछ अभ्यर्थियों के प्रवेश में कथित राजनीतिक सिफारिशों का उल्लेख किए जाने का आरोप भी लगाया गया है। शिकायतकर्ता ने आर्थिक लेन-देन की आशंका जताते हुए इसकी निष्पक्ष जांच की मांग की है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन इनकी गंभीरता को देखते हुए उच्च शिक्षा विभाग को पूरे मामले की जांच करानी चाहिए। यदि प्रवेश प्रक्रिया में किसी प्रकार का अनुचित दबाव, सिफारिश या आर्थिक लेन-देन प्रमाणित होता है, तो यह गंभीर संस्थागत अनियमितता होगी।
जांच एक मामले तक सीमित नहीं, पूरे प्रवेश सत्र की होनी चाहिए

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कथित अनियमितता केवल कुछ अभ्यर्थियों तक सीमित है या पूरे प्रवेश सत्र की प्रक्रिया में ही गड़बड़ी हुई है? इसलिए जांच केवल किसी एक आवेदन तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। सत्र 2026-27 की पूरी मेरिट सूची, चयन सूची, प्रतीक्षा सूची और सभी चयनित अभ्यर्थियों के आवेदन पत्र, अंकसूची, श्रेणी प्रमाणपत्र तथा पात्रता संबंधी दस्तावेजों की जांच होनी चाहिए। मेरिट तैयार करने की मूल शीट, चयन समिति की बैठक के मिनट्स, अनुमोदन संबंधी दस्तावेज और प्रवेश रजिस्टर भी जांच के दायरे में लाए जाएं। यह भी पता लगाया जाए कि मेरिट सूची तैयार होने के बाद उसमें कोई बदलाव तो नहीं किया गया और क्या सभी अभ्यर्थियों पर समान नियम लागू किए गए?
कॉलेज प्रबंधन सार्वजनिक करे प्रवेश का पूरा हिसाब
यदि प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और नियमों के अनुरूप हुई है, तो कॉलेज प्रबंधन को सामने आकर पूरी स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। कुल स्वीकृत सीटें कितनी थीं? श्रेणीवार कटऑफ क्या रही? मेरिट सूची किस आधार पर तैयार की गई? कम अंक वाले अभ्यर्थियों को सूची में स्थान देने का नियम क्या था? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक किया जाना चाहिए। प्रवेश से जुड़े मूल रिकॉर्ड और डिजिटल लॉग भी सुरक्षित रखे जाने चाहिए, ताकि जांच के दौरान किसी प्रकार की छेड़छाड़ की आशंका न रहे।
उच्च शिक्षा विभाग की जवाबदेही भी तय हो
इस मामले को उच्च शिक्षा विभाग और मुख्यमंत्री जनशिकायत पोर्टल तक ले जाने की तैयारी है। मांग की जा रही है कि कॉलेज के आंतरिक जवाब पर निर्भर रहने के बजाय स्वतंत्र जांच टीम गठित की जाए। विभागाध्यक्ष सहित प्रवेश प्रक्रिया से जुड़े सभी जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच हो। यदि अनियमितता प्रमाणित होती है, तो जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध विभागीय और नियमानुसार कानूनी कार्रवाई की जाए तथा प्रभावित पात्र अभ्यर्थियों को नियमों के अनुसार न्याय मिले।
कानून की शिक्षा देने वाले संस्थान में मेरिट ही सवालों के घेरे में!
डी.पी. विप्रा लॉ कॉलेज में उठे ये सवाल केवल प्रवेश प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़े हैं। जिस संस्थान से विद्यार्थी कानून और न्याय की समझ लेकर निकलते हैं, वहां प्रवेश के दौरान ही निष्पक्षता पर सवाल उठना गंभीर चिंता का विषय है। यदि मेरिट सूची में गड़बड़ी हुई है, तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए।अब कॉलेज प्रबंधन को स्पष्ट करना होगा कि प्रवेश प्रक्रिया में मेरिट का पालन हुआ या नहीं। क्या किसी अभ्यर्थी को नियमों से अलग लाभ मिला? क्या कथित सिफारिशों का प्रवेश प्रक्रिया पर प्रभाव पड़ा? और क्या आर्थिक लेन-देन के आरोपों में कोई सच्चाई है? इन सभी सवालों का जवाब स्वतंत्र जांच से ही सामने आ सकता है।
सवाल बड़ा है—डी.पी. विप्रा लॉ कॉलेज में प्रवेश मेरिट से हुआ या कथित प्रभाव और सिफारिश से? अब जरूरत आश्वासन की नहीं, बल्कि दस्तावेजों पर आधारित निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की है।









