GPM – लीना मंडावी के कार्यकाल का एक और बड़ा घोटाला! 15वें वित्त के 1.19 करोड़ के भुगतान में गड़बड़ी, मुकेश रावटे की भूमिका पर सवाल, सचिवों के निलंबन के बाद उसी पंचायत में बहाली, FIR का पत्र बेअसर,
तत्कालीन सीईओ गौरेला खोटले का 10 लाख रुपये का क्या है राज? ख़ुद को बचाने किसको पहुंचाया 10 लाख

15वें वित्त के 1.19 करोड़ का हिसाब कौन देगा? GPM में सरकारी राशि के भुगतान पर गंभीर सवाल, सचिवों की बहाली और FIR की सुस्ती ने खोली व्यवस्था की पोल!
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले में डीएमएफ के बाद अब 15वें वित्त आयोग की राशि के उपयोग को लेकर सामने आया मामला प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। आठ ग्राम पंचायतों से 1 करोड़ 19 लाख 56 हजार रुपये अलग-अलग वेंडरों के खातों में भुगतान किए गए, लेकिन इतनी बड़ी राशि के भुगतान में सामने आई अनियमितताओं के बावजूद आज तक जिम्मेदारी का स्पष्ट निर्धारण नहीं हो सका है। मामला केवल सरकारी राशि के दुरुपयोग का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जिसके माध्यम से पंचायतों के डिजिटल सिस्टम, भुगतान प्रक्रिया और सरकारी धन पर नियंत्रण को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं।

आठ पंचायतों से करोड़ों का भुगतान, आखिर किसके इशारे पर चला पूरा खेल?
ग्राम पंचायत तेंदुमुड़ा, नेवरी नवापारा, ठाड़पथरा, आमाडोब, पूटा, आमगांव, साल्हेघोरी और हर्राटोला में 15वें वित्त आयोग की राशि से कुल 1 करोड़ 19 लाख 56 हजार रुपये का भुगतान किया गया। जांच से जुड़े दस्तावेजों में अधूरे निर्माण कार्यों के बावजूद भुगतान, फर्जी बिल-वाउचर और सरकारी राशि के दुरुपयोग जैसी गंभीर अनियमितताओं के तथ्य सामने आए हैं।

अब सवाल यह है कि जिन कार्यों के नाम पर सरकारी धन निकाला गया, उनका वास्तविक भौतिक सत्यापन किसने किया? भुगतान को मंजूरी किस स्तर पर मिली? जिन वेंडरों के खातों में लाखों रुपये पहुंचे, उनसे अब तक पूरा हिसाब क्यों नहीं लिया गया? केवल सचिवों पर कार्रवाई करके क्या इस पूरे वित्तीय नेटवर्क की जवाबदेही तय हो जाएगी?
ई-ग्राम स्वराज में मोबाइल और ई-मेल बदले, डिजिटल सिग्नेचर का इस्तेमाल किसने किया?

इस मामले का सबसे गंभीर पहलू ई-ग्राम स्वराज पोर्टल से जुड़ा है। शिकायत के अनुसार पंचायत सचिवों के पंजीकृत मोबाइल नंबर और ई-मेल आईडी में बदलाव कर कंप्यूटर ऑपरेटर का नंबर दर्ज किया गया। इसके बाद ओटीपी और भुगतान प्रक्रिया पर सचिवों का नियंत्रण प्रभावित हुआ। पंचायतों के डिजिटल सिग्नेचर सर्टिफिकेट (DSC) के इस्तेमाल से भी भुगतान किए जाने के आरोप सामने आए।
कंप्यूटर ऑपरेटर दीपक जायसवाल की भूमिका को लेकर भी शिकायतकर्ताओं ने सवाल उठाए हैं। ऐसे में केवल मौखिक जांच पर्याप्त नहीं है। पोर्टल के लॉगिन रिकॉर्ड, मोबाइल और ई-मेल बदलने की तारीख, आईपी एड्रेस, ओटीपी रिकॉर्ड और डीएससी के इस्तेमाल की साइबर फॉरेंसिक जांच होनी चाहिए। आखिर डिजिटल सिस्टम में बदलाव किसने किया और किसके निर्देश पर किया?
निलंबन के बाद उसी पंचायत में वापसी, बहाली के फैसले पर सवाल!
आठ पंचायत सचिवों को निलंबित किए जाने के बाद 30 अप्रैल 2026 के कार्यालयीन आदेश से पूर्व की कार्रवाई आगामी आदेश तक स्थगित कर दी गई। इसके बाद सचिवों को उन्हीं पंचायतों में दोबारा पदस्थ कर दिया गया, जहां से वित्तीय अनियमितताओं का मामला सामने आया था।
यहां सबसे बड़ा सवाल जिला पंचायत सीईओ मुकेश रावटे के प्रशासनिक निर्णयों पर उठता है। जब राज्य स्तरीय जांच दल और साइबर जांच लंबित होने का हवाला दिया गया था, तो फिर सचिवों को इतनी जल्दी राहत देने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या बहाली से पहले वित्तीय अनियमितताओं और भुगतान की जिम्मेदारी का पूरा परीक्षण किया गया था?
सचिवों से कथित आर्थिक लेनदेन और बहाली के बदले रकम लिए जाने की चर्चाएं भी सामने आई हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। यदि कोई आर्थिक समझौता नहीं हुआ, तो प्रशासन को बहाली के आदेश का पूरा आधार और संबंधित फाइल सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
FIR के लिए पत्र लिखा, फिर पुलिस कार्रवाई किसने रोक दी?
इस मामले में जिला पंचायत सीईओ मुकेश रावटे की ओर से एफआईआर दर्ज कराने के लिए संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखे जाने की जानकारी सामने आई है। लेकिन सवाल यह है कि जब सरकारी धन के दुरुपयोग और डिजिटल सिस्टम के कथित दुरुपयोग जैसे गंभीर आरोप थे, तो एफआईआर दर्ज कराने की प्रक्रिया आखिर कहां अटक गई?
पत्र जारी करना कार्रवाई नहीं है। वास्तविक कार्रवाई तब मानी जाएगी, जब दोषियों की पहचान हो, एफआईआर दर्ज हो, वेंडरों से भुगतान का हिसाब लिया जाए और सरकारी धन की वसूली सुनिश्चित हो। पत्र भेजने के बाद उसका फॉलोअप किसने किया? पुलिस ने क्या कार्रवाई की? यदि कार्रवाई नहीं हुई तो जिम्मेदार कौन है?
वेंडरों की भूमिका पर चुप्पी क्यों? सरकारी धन लेने वालों का हिसाब कौन मांगेगा?
इस पूरे मामले में वेंडरों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। आखिर किन कार्यों के एवज में लाखों रुपये का भुगतान किया गया? क्या सभी कार्य वास्तव में पूरे हुए थे? क्या बिल-वाउचर वास्तविक थे? क्या वेंडरों ने नियमों के अनुसार सामग्री और सेवाएं उपलब्ध कराई थीं?
यदि भुगतान फर्जी दस्तावेजों या अधूरे कार्यों के आधार पर हुआ है, तो केवल पंचायत सचिवों तक जांच सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। भुगतान प्राप्त करने वाले प्रत्येक वेंडर की भूमिका, बैंक खातों के लेनदेन और संबंधित दस्तावेजों की जांच जरूरी है।
लीना मंडावी के कार्यकाल की प्रशासनिक जवाबदेही भी हो तय
यह पूरा मामला तत्कालीन कलेक्टर लीना मंडावी के कार्यकाल की प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। करोड़ों रुपये के भुगतान, पंचायतों के डिजिटल सिस्टम में बदलाव और वित्तीय अनियमितताओं के बावजूद निगरानी व्यवस्था कैसे विफल रही? संबंधित अधिकारियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की? जिला स्तर पर भुगतान और कार्यों के सत्यापन की जिम्मेदारी किसकी थी?
वहीं जिला पंचायत सीईओ मुकेश रावटे के स्तर से हुए निलंबन, बहाली और एफआईआर संबंधी पत्राचार की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। किसी अधिकारी को केवल पद पर होने के कारण दोषी नहीं माना जा सकता, लेकिन उसके कार्यकाल में लिए गए निर्णयों और प्रशासनिक भूमिका की जांच से भी बचा नहीं जा सकता।
1.19 करोड़ का हिसाब चाहिए, कागजी कार्रवाई नहीं!
अब शासन और जिला प्रशासन को स्पष्ट करना होगा कि 1 करोड़ 19 लाख 56 हजार रुपये के भुगतान में वास्तविक लाभ किसे मिला? सरकारी धन के दुरुपयोग के लिए जिम्मेदार कौन है? सचिवों को वापस उन्हीं पंचायतों में पदस्थ करने का आधार क्या था? कथित लेनदेन की चर्चाओं की जांच कब होगी? वेंडरों से वसूली और एफआईआर की कार्रवाई कब पूरी होगी?
यह मामला किसी एक सचिव या एक पंचायत तक सीमित नहीं है। यह आठ ग्राम पंचायतों की सरकारी राशि, डिजिटल भुगतान व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर प्रकरण है। इसलिए इसकी जांच किसी स्थानीय स्तर की औपचारिकता तक सीमित न रखकर स्वतंत्र उच्चस्तरीय जांच एजेंसी से कराई जानी चाहिए।
10 लाख रुपये के मामले में तत्कालीन गौरेला CEO खोटले की भूमिका पर सवाल, रकम का मुख्य लाभार्थी कौन?
इस पूरे घोटाले में तत्कालीन गौरेला जनपद CEO खोटले की भूमिका भी जांच के दायरे में होनी चाहिए। 10 लाख रुपये की कथित रकम आखिर किसे पहुंचाई गई और इसके पीछे कौन-कौन शामिल थे? क्या यह रकम 15वें वित्त की राशि में हुई अनियमितताओं से जुड़ी थी? यदि हां, तो इस लेनदेन का पूरा हिसाब और इसमें शामिल लोगों की भूमिका सामने आनी चाहिए। आखिर इस पूरे घपले का मुख्य आरोपी कौन है, 10 लाख रुपये किस तक पहुंचे और पर्दे के पीछे किन लोगों का संरक्षण था? इन सवालों का जवाब बिना निष्पक्ष वित्तीय एवं आपराधिक जांच के सामने नहीं आ सकता।
साल की शुरुआत में सामने आए इस मामले में साल के अंत तक भी यदि एफआईआर, वसूली और जिम्मेदारी तय करने की ठोस कार्रवाई नहीं होती, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर सरकारी खजाने की रखवाली करने वाली व्यवस्था में जवाबदेही तय करेगा कौन?









