गौरेला- पेंड्रा- मरवाही- तत्कालीन कलेक्टर लीना मंडावी के कार्यकाल का सबसे बड़ा जमीन घोटाला, एक ही सरकारी जमीन के दो-दो मिशल! मध्यप्रदेश शासन का नाम सफेदा से मिटाकर निजी भू-स्वामी बना दिया, जंगल मद की 16 एकड़ जमीन पर करोड़ों का खेल; क्या है बेमेतरा कनेक्शन?
तत्कालीन कलेक्टर लीना मंडावी के कार्यकाल में शिकायत, जांच और फिर जांच रिपोर्ट गायब होने का आरोप; 2025 में बेमेतरा की IDFC बैंक शाखा में विवादित जमीन बंधक रखकर लाखों का लोन निकालने का मामला, वन विभाग का प्लांटेशन मौजूद होने के बावजूद जमीन बेचने की तैयारी की आशंका

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले में सरकारी जमीनों को निजी संपत्ति में तब्दील करने का खेल किस स्तर तक पहुंच चुका है, इसका एक बेहद गंभीर मामला तहसील सकोला के ग्राम सेखवा से सामने आया है। यहां बड़े झाड़ जंगल मद की करीब 16 एकड़ बेशकीमती शासकीय भूमि को कथित रूप से राजस्व अभिलेखों में हेराफेरी कर निजी स्वामित्व में दर्ज कराने का आरोप है। इस पूरे प्रकरण में सेखवा निवासी बेबी लता और उनके पति शिक्षक शंकर प्रजापति का नाम सामने आ रहा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक ही भूमि के दो अलग-अलग मिशल मौजूद होने का दावा किया जा रहा है। एक मिशल में भूमि बड़े झाड़ जंगल मद के रूप में दर्ज है, जबकि दूसरे में मध्यप्रदेश शासन का नाम सफेदा से मिटाकर निजी भू-स्वामी का नाम दर्ज किए जाने का आरोप है।
यह केवल जमीन के स्वामित्व का विवाद नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेजों की विश्वसनीयता, राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और प्रशासनिक संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करने वाला मामला है। आरोपों के मुताबिक, करोड़ों रुपये मूल्य की सरकारी जमीन को पहले कागजों में निजी बनाया गया, फिर उसी विवादित भूमि को बैंक में बंधक रखकर लाखों रुपये का लोन भी निकाल लिया गया। हैरानी यह है कि इस पूरे मामले की शिकायत तत्कालीन कलेक्टर लीना मंडावी के कार्यकाल में दस्तावेजों के साथ की गई थी। जांच होने की बात भी सामने आई, लेकिन आज तक न तो कोई निर्णायक कार्रवाई हुई और न ही शिकायतकर्ता को जांच रिपोर्ट मिल सकी।

एक ही जमीन के दो-दो मिशल, आखिर कौन सा रिकॉर्ड असली और कौन सा फर्जी?
इस पूरे जमीन घोटाले का सबसे महत्वपूर्ण और चौंकाने वाला पहलू खसरा नंबर 1408 से जुड़ा है। शिकायतकर्ता का दावा है कि उसके पास इसी भूमि के दो अलग-अलग मिशल मौजूद हैं, जिन्हें शिकायत के साथ प्रशासन को भी सौंपा गया था। एक मिशल में भूमि की प्रकृति बड़े झाड़ जंगल मद दर्ज है और मध्यप्रदेश शासन का स्वामित्व दर्शाया गया है, जबकि दूसरे मिशल में कथित रूप से सफेदा लगाकर शासन की प्रविष्टि मिटाई गई और निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज कर दिए गए।

सवाल यह है कि किसी एक ही भूमि के दो-दो अलग-अलग मूल राजस्व अभिलेख आखिर कैसे अस्तित्व में आ गए? यदि एक मिशल में भूमि शासकीय जंगल मद की है और दूसरे में निजी स्वामित्व दर्शाया गया है, तो इस बदलाव का वैधानिक आधार क्या है? किस सक्षम अधिकारी ने आदेश जारी किया? किसके निर्देश पर मूल अभिलेख में सुधार किया गया? और सबसे महत्वपूर्ण, सरकारी रिकॉर्ड में सफेदा लगाकर पुरानी प्रविष्टि मिटाने की अनुमति किसने दी?
सफेदा लगाकर मिटाया गया मध्यप्रदेश शासन का नाम, मिशल में कूट रचना के गंभीर आरोप

शिकायत में आरोप लगाया गया है कि खसरा नंबर 1408 की भूमि पूर्व में मध्यप्रदेश शासन के नाम दर्ज थी। पुराने राजस्व अभिलेखों में इस जमीन की प्रकृति बड़े झाड़ जंगल मद के रूप में दर्ज रही है। लेकिन बाद में मूल मिशल में कथित रूप से सफेद स्याही लगाकर मध्यप्रदेश शासन की प्रविष्टि मिटाई गई और निजी भू-स्वामियों के नाम दर्ज कर दिए गए।
शिकायत में यह भी उल्लेख किया गया है कि खसरा नंबर 1408/1, जिसका रकबा लगभग 25.54 एकड़ बताया गया है, उसमें कथित रूप से बदलाव कर 1408/1/2 के रूप में लगभग 16.36 एकड़ भूमि अलग दर्शाई गई तथा ईश्वरदीन और ददुवा के नाम जोड़े गए। यह पूरा घटनाक्रम राजस्व अभिलेखों में बड़े स्तर पर छेड़छाड़ की आशंका पैदा करता है।
सबसे गंभीर बात यह है कि किसी जमीन की मूल प्रकृति और ऐतिहासिक स्थिति का पता उसके पुराने राजस्व अभिलेखों से चलता है। ऐसे में यदि मूल मिशल में ही बदलाव कर दिया जाए तो जमीन की वास्तविक पहचान को ही बदलने का रास्ता खुल जाता है। यह कथित कृत्य केवल राजस्व अनियमितता नहीं, बल्कि सरकारी दस्तावेजों में कूट रचना की गंभीर आशंका से जुड़ा है।
1954-55 से लेकर 1999-2000 तक के रिकॉर्ड में शासकीय भूमि, फिर अचानक निजी कैसे?
शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार, वर्ष 1954-55 के अधिकार अभिलेख में खाता क्रमांक 344 से संबंधित प्रविष्टियों में भी लाल स्याही से छेड़छाड़ किए जाने का आरोप है। वहीं वर्ष 1989-90, 1994-95 और 1999-2000 के राजस्व अभिलेखों में संबंधित भूमि मध्यप्रदेश शासन के नाम दर्ज होने की बात कही गई है।
जब दशकों पुराने रिकॉर्ड में जमीन की पहचान बड़े झाड़ जंगल मद और शासकीय भूमि के रूप में सामने आती है, तो फिर बाद के अभिलेखों में निजी नाम किस आधार पर दर्ज हुए? क्या इसके लिए कोई वैध पट्टा जारी हुआ था? क्या शासन की अनुमति ली गई थी? क्या वन एवं राजस्व विभाग की अनापत्ति प्राप्त की गई थी? यदि ऐसा कोई आदेश मौजूद है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
इन सवालों का जवाब मूल अभिलेखों की निष्पक्ष जांच और दस्तावेजों के फोरेंसिक परीक्षण से ही सामने आ सकता है।
शिकायतकर्ता ने एक-एक बिंदु में खोली गड़बड़ी, दो मिशल भी सौंपे, फिर भी कार्रवाई नहीं!
इस पूरे प्रकरण में सबसे हैरान करने वाली बात प्रशासन की निष्क्रियता है। शिकायतकर्ता ने 29 दिसंबर 2023 को कलेक्टर कार्यालय में लिखित शिकायत प्रस्तुत की थी। शिकायत में केवल सामान्य आरोप नहीं लगाए गए, बल्कि कथित अनियमितताओं को एक-एक बिंदु में विस्तार से दर्ज किया गया। पुराने राजस्व अभिलेखों, मिशल में अंतर, शासन के नाम की प्रविष्टि मिटाए जाने और निजी नाम दर्ज किए जाने से संबंधित दस्तावेज भी संलग्न किए गए।
शिकायतकर्ता का कहना है कि उसके पास उसी भूमि के दो अलग-अलग मिशल हैं और दोनों की प्रतियां शिकायत के साथ प्रशासन को उपलब्ध कराई गई थीं। यानी जिस कथित छेड़छाड़ की जांच की मांग की जा रही थी, उसके दस्तावेजी प्रमाण भी प्रशासन के सामने रखे गए थे। इसके बावजूद लंबे समय तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना अपने आप में प्रशासनिक व्यवस्था पर बड़ा सवाल है।
आखिर जब शिकायतकर्ता दो अलग-अलग मिशल प्रस्तुत कर रहा था, तब प्रशासन ने मूल रिकॉर्ड जब्त कर उनकी जांच क्यों नहीं कराई? संबंधित पटवारी, राजस्व निरीक्षक, तहसीलदार और अन्य अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल क्यों नहीं हुई? क्या सरकारी जमीन के मामले में भी कार्रवाई के लिए किसी और दबाव या प्रभाव का इंतजार किया जा रहा था?
तत्कालीन कलेक्टर लीना मंडावी के कार्यकाल में शिकायत, जांच हुई और फिर गायब हो गई जांच रिपोर्ट!
इस मामले में तत्कालीन कलेक्टर लीना मंडावी के कार्यकाल को लेकर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि वर्ष 2023-24 के दौरान दस्तावेजों सहित शिकायत प्रस्तुत की गई थी। शिकायत के बाद जांच की प्रक्रिया भी हुई और पटवारी स्तर पर जांच रिपोर्ट तैयार किए जाने की बात सामने आई। लेकिन इसके बाद सबसे बड़ा सवाल खड़ा हुआ कि आखिर वह जांच रिपोर्ट कहां चली गई?
शिकायतकर्ता के अनुसार, जांच रिपोर्ट प्राप्त करने के लिए सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से भी प्रयास किया गया। इसके अलावा अन्य माध्यमों से भी रिपोर्ट हासिल करने की कोशिश की गई, लेकिन लंबे प्रयासों के बावजूद जांच रिपोर्ट हाथ नहीं लगी।
यदि जांच हुई थी तो उसकी रिपोर्ट कहां है? जांच में क्या तथ्य सामने आए? क्या मिशल में छेड़छाड़ की पुष्टि हुई थी? किन अधिकारियों की भूमिका संदिग्ध पाई गई? और यदि जांच में गड़बड़ी सामने आई थी तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
यहां सवाल केवल तत्कालीन कलेक्टर की प्रशासनिक जिम्मेदारी का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था का है जिसके अंतर्गत शिकायत प्राप्त हुई, जांच हुई, लेकिन उसका परिणाम आज तक सामने नहीं आया।
लीना मंडावी के बेमेतरा कनेक्शन और IDFC बैंक में जमीन बंधक होने का संयोग भी जांच के घेरे में
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू वर्ष 2025 में सामने आया, जब आरोपों के अनुसार इसी विवादित जमीन को बेमेतरा स्थित IDFC बैंक की शाखा में बंधक रखकर लाखों रुपये का लोन निकाला गया। जिस भूमि के स्वामित्व को लेकर वर्ष 2023 से शिकायत और जांच की मांग चल रही थी, उसी जमीन को बैंक में गिरवी रखकर वित्तीय लाभ ले लिया गया।
यहां एक और महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। तत्कालीन कलेक्टर लीना मंडावी पूर्व में बेमेतरा जिले में जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) के पद पर कार्य कर चुकी हैं। अब स्थानीय स्तर पर इस पुराने प्रशासनिक कनेक्शन और उसी बेमेतरा की IDFC बैंक शाखा में विवादित जमीन बंधक रखे जाने को लेकर चर्चाएं तेज हैं।
सूत्रों के हवाले से इस पूरे घटनाक्रम में एक शीर्ष महिला अधिकारी के कनेक्शन की चर्चा भी हो रही है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है और न ही केवल पूर्व पदस्थापना या बैंक की शाखा के आधार पर किसी अधिकारी की संलिप्तता साबित होती है। लेकिन शिकायत पर कार्रवाई नहीं होना, जांच रिपोर्ट का उपलब्ध नहीं होना और बाद में उसी विवादित भूमि का बेमेतरा में बंधक होना—इन सभी घटनाओं के क्रम की स्वतंत्र जांच आवश्यक हो गई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब जमीन के स्वामित्व पर विवाद और शिकायत पहले से मौजूद थी, तब बैंक ने किन दस्तावेजों के आधार पर उसे स्वीकार किया? क्या बैंक ने मूल मिशल की जांच की? क्या सरकारी भूमि होने की आशंका की पुष्टि कराई गई? क्या ऋण स्वीकृत करने से पहले राजस्व विभाग से सत्यापन कराया गया था?
वन विभाग का प्लांटेशन मौजूद, फिर भी भू-माफियाओं की जमीन बेचने की तैयारी?
इस प्रकरण का एक और गंभीर पहलू जमीन की वास्तविक स्थिति से जुड़ा है। शिकायतकर्ता के अनुसार, जिस भूमि को कागजों में निजी बताया जा रहा है, उस स्थल पर आज भी वन विभाग का प्लांटेशन मौजूद है। प्राकृतिक रूप से साल के पेड़ों की मौजूदगी और वन विभाग द्वारा नीलगिरी के पौधारोपण का भी उल्लेख किया गया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि यदि जमीन वास्तव में बड़े झाड़ जंगल मद की शासकीय भूमि है तो उस पर निजी स्वामित्व का दावा किस आधार पर किया जा रहा है? क्या जमीन की बिक्री की तैयारी इसी कथित फर्जी रिकॉर्ड के आधार पर की जा रही है? यदि विवादित भूमि का सौदा हो गया तो सरकारी संपत्ति को वापस हासिल करना और भी मुश्किल हो सकता है।
इसलिए प्रशासन को तत्काल मौके का सीमांकन कराकर राजस्व और वन विभाग के संयुक्त दल से वास्तविक स्थिति की जांच करानी चाहिए तथा जांच पूरी होने तक किसी भी प्रकार के हस्तांतरण और निर्माण पर वैधानिक रोक लगाने की कार्रवाई करनी चाहिए।
कार्रवाई नहीं होने के पीछे कई राजस्व अधिकारियों के फंसने का डर या मोटे लेनदेन का खेल?
इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर आरोप प्रशासनिक संरक्षण और कथित लेनदेन को लेकर लगाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ता और स्थानीय स्तर पर उठ रहे सवालों के मुताबिक, यदि इस मामले की निष्पक्ष जांच होती है तो केवल वर्तमान भू-स्वामित्व का दावा करने वाले लोग ही नहीं, बल्कि पुराने रिकॉर्ड में बदलाव करने वाले कई राजस्व अधिकारी और कर्मचारी भी जांच के दायरे में आ सकते हैं।
आरोप है कि इसी संभावित जवाबदेही के कारण कार्रवाई को आगे बढ़ने नहीं दिया गया और कथित तौर पर मोटी रकम के लेनदेन के जरिए मामले को रफा-दफा कर दिया गया। हालांकि इस कथित लेनदेन का स्वतंत्र प्रमाण और संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष सामने आना अभी बाकी है।
लेकिन सवाल बेहद सीधा है—यदि शिकायत निराधार थी तो जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने में परेशानी क्यों? यदि दस्तावेज सही थे तो कार्रवाई क्यों नहीं? और यदि सरकारी भूमि को निजी बनाने में किसी प्रकार की अनियमितता नहीं हुई तो दो अलग-अलग मिशल की मौजूदगी का स्पष्टीकरण कौन देगा?
बेबी लता और शंकर प्रजापति की भूमिका पर सवाल, प्रशासनिक संरक्षण की भी हो जांच
इस पूरे मामले में बेबी लता और उनके पति शंकर प्रजापति का नाम इसलिए चर्चा में है क्योंकि विवादित भूमि पर निजी स्वामित्व और उससे जुड़े दस्तावेजों को लेकर शिकायत की गई है। आरोप है कि शासकीय भूमि को निजी नाम पर दर्ज कराने के बाद उसका उपयोग बैंक से ऋण लेने के लिए किया गया।
अब जांच का दायरा केवल नामांतरण तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि कथित पट्टा किस आधार पर तैयार हुआ, मिशल में किसने और कब बदलाव किया, संबंधित अधिकारियों ने किस दस्तावेज के आधार पर निजी स्वामित्व स्वीकार किया और बैंक में बंधक रखने की प्रक्रिया में कौन-कौन से दस्तावेज प्रस्तुत किए गए।
साथ ही तत्कालीन प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका, शिकायत पर हुई जांच और जांच रिपोर्ट के गायब होने के आरोपों की भी स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
अब प्रशासन के सामने सबसे बड़े सवाल
ग्राम सेखवा की करीब 16 एकड़ बड़े झाड़ जंगल मद की भूमि आखिर निजी कैसे हो गई? एक ही जमीन के दो-दो मिशल किसने तैयार किए? मध्यप्रदेश शासन का नाम सफेदा से मिटाने की अनुमति किस अधिकारी ने दी? वर्ष 2023 में शिकायत के बाद हुई जांच की रिपोर्ट कहां गायब हो गई? तत्कालीन प्रशासन ने कार्रवाई क्यों नहीं की? विवादित जमीन पर बैंक ने लाखों रुपये का लोन किन दस्तावेजों के आधार पर स्वीकृत किया? और क्या इस पूरे मामले में राजस्व विभाग के अधिकारियों के साथ किसी उच्चस्तरीय संरक्षण की भूमिका भी है?
अब कागजी जांच नहीं, मूल मिशल की फोरेंसिक जांच जरूरी
इस मामले में केवल विभागीय जांच या औपचारिक जवाबदेही तय करना पर्याप्त नहीं होगा। खसरा नंबर 1408 और उससे जुड़े सभी उपखसरों के मूल मिशल, वर्ष 1954-55 के अधिकार अभिलेख, 1989-90, 1994-95 और 1999-2000 के राजस्व रिकॉर्ड तथा वर्तमान अभिलेखों का स्वतंत्र विशेषज्ञों से फोरेंसिक परीक्षण कराया जाना चाहिए। सफेदा और लाल स्याही से कथित रूप से की गई छेड़छाड़ की तकनीकी जांच होनी चाहिए। पुराने रिकॉर्ड और वर्तमान रिकॉर्ड के बीच हुए प्रत्येक बदलाव का आदेश, तारीख और जिम्मेदार अधिकारी सामने लाया जाना चाहिए।
साथ ही, तत्कालीन जांच रिपोर्ट की खोज कर उसे सार्वजनिक किया जाए, बैंक से ऋण स्वीकृति और बंधक से संबंधित दस्तावेज प्राप्त किए जाएं तथा वन विभाग से भूमि की वास्तविक स्थिति की रिपोर्ट ली जाए। यदि सरकारी दस्तावेजों में कूट रचना, अवैध नामांतरण या भ्रष्टाचार प्रमाणित होता है तो संबंधित व्यक्तियों और अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज कर कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
एक जमीन नहीं, पूरे राजस्व सिस्टम की साख दांव पर!
ग्राम सेखवा का यह मामला अब केवल बेबी लता और शंकर प्रजापति से जुड़ा जमीन विवाद नहीं रह गया है। यह उस प्रशासनिक व्यवस्था की परीक्षा है, जिसमें एक ही भूमि के दो-दो मिशल होने का दावा है, सरकारी स्वामित्व की प्रविष्टि मिटाने के आरोप हैं, शिकायत के बाद जांच होने की बात है, लेकिन जांच रिपोर्ट ही उपलब्ध नहीं है और अंततः विवादित जमीन बैंक में बंधक रखकर लाखों रुपये का ऋण ले लिया गया।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी जमीन को निजी बनाने के इस कथित खेल में शामिल लोगों को इसलिए बचाया जा रहा है क्योंकि जांच की आंच कई राजस्व अधिकारियों तक पहुंच सकती है? अब जरूरत ऐसी निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की है जो किसी पद, प्रभाव या पुराने प्रशासनिक संबंध से प्रभावित न हो। वरना सरकारी जमीन के मूल अभिलेखों में छेड़छाड़ के आरोपों के बीच यह मामला पूरे राजस्व तंत्र की साख पर गंभीर सवाल बनकर खड़ा रहेगा।









