PENDRA: वनभूमि पर कब्जा, फिर कानून की ढाल!”शासकीय शिक्षक शैलेष साहू ने जंगल(वन )भूमि पर कब्जा कर बना लिया आलीशान महल?
बेदखली आदेश के बाद भी नहीं टूटा निर्माण, “राजस्व विभाग को अधिकार नहीं” कहकर कार्रवाई पर सवाल

पेंड्रा। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले के पेंड्रा क्षेत्र में शासकीय बड़े झाड़ जंगल मद की भूमि पर कब्जे का मामला अब गंभीर विवाद का रूप लेता जा रहा है। नायब तहसीलदार न्यायालय द्वारा अतिक्रमण सिद्ध मानते हुए बेदखली आदेश और 10 हजार रुपये अर्थदंड लगाए जाने के बावजूद अब तक कथित अवैध निर्माण नहीं हटाए जाने से प्रशासनिक कार्रवाई पर सवाल उठने लगे हैं।
मामले में बसंतपुर निवासी शासकीय शिक्षक शैलेष साहू और उनके परिवार का नाम सामने आया है। शिकायतकर्ता द्वारा आरोप लगाया गया था कि ग्राम बसंतपुर तहसील पेंड्रा स्थित बड़े झाड़ जंगल मद की शासकीय भूमि पर कब्जा कर पक्का निर्माण कराया गया है। मामले की सुनवाई के बाद नायब तहसीलदार न्यायालय ने हल्का पटवारी की जांच रिपोर्ट और राजस्व अभिलेखों का परीक्षण करते हुए अतिक्रमण पाए जाने की पुष्टि की।

न्यायालय द्वारा जारी आदेश में कहा गया कि खसरा नंबर 383/1, 383/5, 383/11 एवं 383/12 के अंश भाग पर अनाधिकृत कब्जा किया गया है। इसके बाद छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के तहत कार्रवाई करते हुए अनावेदकों पर 10 हजार रुपये का अर्थदंड लगाया गया तथा शासकीय भूमि से बेदखली के आदेश जारी किए गए। जानकारी के अनुसार मामले में बेदखली वारंट भी जारी हो चुका है।
हालांकि विवाद तब और बढ़ गया जब अनावेदक पक्ष ने जवाब प्रस्तुत करते हुए कहा कि संबंधित भूमि “वनभूमि” है और उस पर कार्रवाई करने का अधिकार राजस्व विभाग को नहीं बल्कि वन विभाग को है। अब क्षेत्र में यह सवाल उठ रहा है कि यदि भूमि वनभूमि है, तो आखिर वहां निर्माण और कब्जा कैसे हुआ?

स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी वन भूमि पर कब्जा करने के बाद अब कानून की तकनीकी व्याख्या कर कार्रवाई से बचने की कोशिश की जा रही है। लोगों में इस बात को लेकर नाराजगी है कि जिस मामले में न्यायालय अतिक्रमण सिद्ध मान चुका है, वहां अब तक निर्माण जस का तस खड़ा हुआ है। क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज है कि यदि किसी गरीब व्यक्ति द्वारा शासकीय भूमि पर झोपड़ी बनाई जाती तो प्रशासन तत्काल बुलडोजर चला देता, लेकिन यहां पक्का निर्माण होने के बावजूद कार्रवाई अधूरी दिखाई दे रही है।
मामले में यह आरोप भी चर्चा में है एक शासकीय शिक्षक पर ही भू-माफिया की तरह सरकारी जंगल भूमि पर कब्जा करने के आरोप सिद्ध हो चुका हैं। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सरकारी सेवा में रहते हुए यदि कोई व्यक्ति शासकीय वन भूमि पर कब्जा करता है, तो यह गंभीर प्रशासनिक और नैतिक प्रश्न खड़ा करता है।

नायब तहसीलदार न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि मकान तोड़ने का अधिकार राजस्व न्यायालय के क्षेत्राधिकार में नहीं आता। हालांकि जानकारों का मानना है कि बेदखली आदेश के बाद जिला प्रशासन संयुक्त कार्रवाई कर अवैध निर्माण हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है। सबसे बड़ा सवाल ये है कि जब अतिक्रमण सिद्ध हो चुका, बेदखली वारंट जारी हो चुका, तब आखिर शासकीय जंगल भूमि कब खाली होगी?









