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गौरेला पेंड्रा मरवाही- करहनी जमीन फर्जीवाड़े का कथित मुख्य किरदार सूर्यकांत चंदेल अब धमकी देने पर उतारू! 8.6 एकड़ आदिवासी जमीन के दस्तावेजी खेल में भूमिका पर गंभीर आरोप, शपथपत्र के हस्ताक्षरों की फॉरेंसिक जांच की मांग

मृत जोहरी बाई को जीवित दर्शाने के कथित मामले में 11 मार्च 2026 का शपथपत्र जांच के केंद्र में, दस्तावेज तैयार कराने में सूर्यकांत चंदेल की भूमिका होने का आरोप! शिकायतकर्ता पक्ष का दावा—फर्जीवाड़े में नाम सामने आने के बाद अब धमकियों का सहारा, पुलिस और प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग।

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गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। मरवाही तहसील के ग्राम करहनी में लगभग 8.6 एकड़ आदिवासी भूमि की कथित फर्जी रजिस्ट्री का मामला अब एक नए मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। जमीन के दस्तावेजों में कथित हेराफेरी, मृत महिला को जीवित दर्शाने और शपथपत्र के जरिए पहचान संबंधी विवरण बदलने के आरोपों के बीच अब सूर्यकांत चंदेल की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। शिकायतकर्ता पक्ष ने सूर्यकांत चंदेल को इस कथित फर्जीवाड़े की मुख्य कड़ी बताते हुए आरोप लगाया है कि दस्तावेज तैयार कराने की पूरी प्रक्रिया में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इतना ही नहीं, शिकायतकर्ता पक्ष का यह भी आरोप है कि मामले में नाम सामने आने के बाद अब सूर्यकांत चंदेल धमकी देने पर उतारू है। यदि ये आरोप सही हैं तो यह केवल जमीन के कथित फर्जीवाड़े का मामला नहीं, बल्कि शिकायतकर्ताओं को दबाव में लेने की कोशिश का भी गंभीर विषय है।

8.6 एकड़ आदिवासी जमीन का कथित फर्जीवाड़ा, सूर्यकांत चंदेल की भूमिका पर सवाल!

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पूरा मामला ग्राम करहनी की भूमि खसरा नंबर 12/20, 12/21, 12/22, 98/1, 98/3, 99/1 एवं 99/5 से जुड़ा है। शिकायतकर्ता सोमवती पति लवन सिंह, निवासी ग्राम पोड़ी ने आरोप लगाया है कि स्वर्गीय जोहरी बाई गोंड़ का निधन वर्ष 2010 में हो चुका था, लेकिन वर्ष 2026 में उन्हें दस्तावेजों में जीवित दर्शाकर तथा पहचान और जाति संबंधी विवरणों में कथित बदलाव कर लगभग 8.6 एकड़ आदिवासी भूमि की रजिस्ट्री अविनाश एनर्जी प्रा. लिमिटेड (मुकेश सिंघानिया) के पक्ष में करा दी गई।

इस पूरे प्रकरण में शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि सूर्यकांत चंदेल ने कथित फर्जी दस्तावेज तैयार कराने और इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। अब जांच का विषय यह है कि संबंधित दस्तावेज किसने तैयार किए, किसने पहचान प्रमाणित की और जमीन के हस्तांतरण की प्रक्रिया में किन लोगों की भूमिका रही।

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11 मार्च 2026 का शपथपत्र, फर्जीवाड़े की जांच में अहम दस्तावेज!

मामले में सामने आए 10 रुपये के गैर-न्यायिक स्टांप पेपर पर निष्पादित शपथपत्र ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। इस शपथपत्र में बलपतिया केवट उर्फ जोहरी बाई, पति तिलकधारी केवट, उम्र लगभग 55 वर्ष, निवासी ग्राम सिवनी, तहसील मरवाही का उल्लेख है। दस्तावेज पर सत्यापन की तारीख 11 मार्च 2026 दर्ज है।

शपथपत्र में ग्राम करहनी की संबंधित भूमि के खसरा नंबरों और कुल रकबा 3.501 हेक्टेयर का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि राजस्व अभिलेखों में जोहरी बाई नाम दर्ज है, जबकि आधार कार्ड में बलपतिया केवट नाम दर्ज है। दोनों नाम एक ही व्यक्ति के होने का दावा करते हुए राजस्व अभिलेखों में नाम दर्ज किए जाने का समर्थन किया गया है।

लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जोहरी बाई की मृत्यु वर्ष 2010 में हो चुकी थी, जैसा कि शिकायतकर्ता का दावा है, तो 11 मार्च 2026 को उनके नाम से यह शपथपत्र किसने निष्पादित कराया? क्या संबंधित महिला की वास्तविक पहचान का सत्यापन किया गया था? क्या मृत्यु प्रमाण पत्र और आधार कार्ड का मिलान हुआ था? शपथपत्र के समय संबंधित व्यक्ति स्वयं उपस्थित थी या नहीं?

इन सवालों का जवाब शपथपत्र की मूल प्रति, नोटरी रिकॉर्ड, पहचान संबंधी दस्तावेजों और संबंधित अधिकारियों के बयान से ही सामने आ सकता है।

सूर्यकांत चंदेल के हस्ताक्षरों का फॉरेंसिक मिलान कराने की मांग!

शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि सूर्यकांत चंदेल इस कथित दस्तावेजी हेराफेरी की प्रमुख कड़ी है। ऐसे में जांच एजेंसियों से मांग की जा रही है कि 11 मार्च 2026 के शपथपत्र पर मौजूद हस्ताक्षरों और लिखावट की तुलना सूर्यकांत चंदेल के प्रमाणित नमूना हस्ताक्षरों तथा अन्य संबंधित दस्तावेजों से कराई जाए।

यदि हस्तलेखन विशेषज्ञ की रिपोर्ट में समानता सामने आती है तो यह जांच के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है। हालांकि, केवल देखने में हस्ताक्षर समान लगने से किसी व्यक्ति को दस्तावेज तैयार करने वाला या फर्जीवाड़े का आरोपी घोषित नहीं किया जा सकता। इसके लिए मूल दस्तावेजों और वैज्ञानिक परीक्षण की आवश्यकता है।

जांच एजेंसियों को यह भी पता लगाना चाहिए कि शपथपत्र किसने तैयार कराया, किसने लिखवाया, पहचानकर्ता कौन था, नोटरी के समक्ष कौन उपस्थित हुआ और इस दस्तावेज का इस्तेमाल आगे जमीन के हस्तांतरण में किस प्रकार किया गया।

फर्जीवाड़े के आरोपों के बीच अब धमकियों का भी आरोप, शिकायतकर्ता की सुरक्षा का सवाल!

इस पूरे मामले में अब एक और गंभीर पहलू सामने आया है। शिकायतकर्ता पक्ष का आरोप है कि सूर्यकांत चंदेल मामले में अपनी भूमिका को लेकर सवाल उठने के बाद धमकी देने पर उतारू है। यदि जमीन के कथित फर्जीवाड़े की शिकायत करने वालों को डराने या दबाव में लेने की कोशिश की जा रही है तो यह प्रशासन और पुलिस के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए।

सवाल यह है कि क्या शिकायतकर्ताओं को स्वतंत्र रूप से अपनी बात रखने और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर मिल रहा है? क्या कथित धमकियों की पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई है? यदि शिकायत दर्ज हुई है तो उस पर क्या कार्रवाई हुई?

पुलिस प्रशासन को चाहिए कि धमकी संबंधी शिकायतों की निष्पक्ष जांच करे और शिकायतकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करे। किसी भी व्यक्ति को जांच से बचने या शिकायतकर्ता को डराने का अधिकार नहीं है।

अब प्रशासन और पुलिस के सामने सीधे सवाल!

करहनी की 8.6 एकड़ आदिवासी भूमि के कथित फर्जीवाड़े में 11 मार्च 2026 का शपथपत्र किसने तैयार कराया?

बलपतिया केवट उर्फ जोहरी बाई की पहचान का सत्यापन किस आधार पर किया गया?

यदि संबंधित महिला की मृत्यु वर्ष 2010 में हुई थी तो वर्ष 2026 में उनके नाम से शपथपत्र कैसे निष्पादित हुआ?

सूर्यकांत चंदेल की कथित भूमिका की जांच कब होगी?

क्या शपथपत्र और अन्य दस्तावेजों पर मौजूद हस्ताक्षरों का फॉरेंसिक मिलान कराया जाएगा?

शिकायतकर्ताओं को धमकी देने के आरोपों पर पुलिस ने क्या कार्रवाई की है?

और सबसे महत्वपूर्ण, लगभग 8.6 एकड़ आदिवासी भूमि के कथित हस्तांतरण में शामिल सभी लोगों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कब पूरी होगी?

अब पर्दे के पीछे के किरदारों की पहचान जरूरी!

करहनी जमीन मामले में केवल रजिस्ट्री और नामांतरण की जांच करके जिम्मेदारी पूरी नहीं हो सकती। कथित दस्तावेजी हेराफेरी की शुरुआत से लेकर शपथपत्र तैयार कराने, पहचान प्रमाणित करने और जमीन के हस्तांतरण तक पूरी प्रक्रिया की जांच आवश्यक है।

सूर्यकांत चंदेल पर लगाए गए आरोपों की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। उसके प्रमाणित हस्ताक्षरों और संबंधित दस्तावेजों का फॉरेंसिक परीक्षण कराया जाए। कथित धमकियों की शिकायतों पर पुलिस कार्रवाई करे और शिकायतकर्ता को सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए।

करहनी की 8.6 एकड़ आदिवासी जमीन का सच सामने आना चाहिए। सवाल सिर्फ यह नहीं कि जमीन की रजिस्ट्री कैसे हुई, बल्कि यह भी है कि दस्तावेज किसने तैयार कराए, पहचान किसने प्रमाणित की और इस पूरे कथित खेल से लाभ किसे मिला? अब प्रशासन को दस्तावेजों के आधार पर जांच कर वास्तविक जिम्मेदारों की पहचान करनी होगी।

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