गौरेला- पेंड्रा – मरवाही : भाजपा किसान मोर्चा का जिला उपाध्यक्ष या भू-माफिया या गुंडा सूर्यकांत सिंह चंदेल? करहनी की आदिवासी जमीन के कथित फर्जीवाड़े में नाम, पार्टी की साख पर उठे सवाल
फेसबुक प्रोफाइल पर भाजपा किसान मोर्चा के जिला उपाध्यक्ष होने का दावा, 8.6 एकड़ आदिवासी जमीन के विवाद में भूमिका को लेकर शिकायतकर्ता ने उठाए गंभीर सवाल; धमकी देने के आरोपों की भी निष्पक्ष जांच की मांग

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले में करहनी की लगभग 8.6 एकड़ आदिवासी जमीन से जुड़ा विवाद लगातार गंभीर होता जा रहा है। इस मामले में अब सूर्यकांत चंदेल का नाम भी चर्चा के केंद्र में है। उनके फेसबुक प्रोफाइल पर उन्हें भारतीय जनता पार्टी किसान मोर्चा का जिला उपाध्यक्ष, जिला गौरेला-पेंड्रा-मरवाही बताया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा संगठन में महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ सामने आ रहे जमीन संबंधी गंभीर आरोपों की पार्टी जांच कराएगी?
शिकायतकर्ता की ओर से आरोप लगाया गया है कि करहनी की आदिवासी जमीन से जुड़े दस्तावेजों में कथित हेरफेर और फर्जीवाड़े के पूरे घटनाक्रम में सूर्यकांत सिंह चंदेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आरोप यह भी है कि इस मामले को लेकर सवाल उठाने और शिकायत करने वालों को दबाव में लेने तथा धमकाने की कोशिश की जा रही है। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित दस्तावेजों की आधिकारिक जांच अभी आवश्यक है।

मामले का सबसे गंभीर पहलू लगभग 8.6 एकड़ जमीन से जुड़ा है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2010 में मृत हो चुकी आदिवासी महिला को वर्ष 2026 के दस्तावेजों में जीवित दर्शाकर जमीन के हस्तांतरण की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। शपथपत्र में नाम और पहचान से जुड़े अंतर का भी उल्लेख सामने आया है। शिकायतकर्ता ने शपथपत्र पर किए गए हस्ताक्षरों, पहचान संबंधी दस्तावेजों और पूरे दस्तावेजी क्रम की फॉरेंसिक जांच कराने की मांग की है।
अब सवाल सिर्फ जमीन के कथित फर्जीवाड़े का नहीं, बल्कि राजनीतिक जवाबदेही का भी है। यदि सूर्यकांत सिंह चंदेल वास्तव में भाजपा किसान मोर्चा के जिला उपाध्यक्ष हैं, तो संगठन को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या उन्हें इस मामले की जानकारी है? क्या पार्टी ने आरोपों की जांच कराई है? क्या संबंधित व्यक्ति से जवाब मांगा गया है? और यदि आरोपों में तथ्य पाए जाते हैं तो क्या संगठनात्मक कार्रवाई होगी?

भाजपा किसान मोर्चा किसानों और उनकी जमीन के अधिकारों की बात करता है। ऐसे में आदिवासी जमीन से जुड़े इतने गंभीर आरोपों के बीच संगठन की चुप्पी पर सवाल उठना स्वाभाविक है। पार्टी की छवि और आदिवासी समाज के अधिकारों से जुड़े इस मामले में निष्पक्ष जांच और स्पष्ट जवाब जरूरी है।
अब प्रशासन और भाजपा संगठन से सीधे सवाल हैं— करहनी जमीन मामले में सूर्यकांत सिंह चंदेल की कथित भूमिका की जांच कब होगी? विवादित शपथपत्र और हस्ताक्षरों की फॉरेंसिक जांच कराई जाएगी या नहीं? शिकायतकर्ताओं को धमकी देने के आरोपों पर पुलिस क्या कार्रवाई करेगी? और क्या भाजपा संगठन अपने जिला उपाध्यक्ष के संबंध में सामने आए इन गंभीर आरोपों पर आधिकारिक बयान जारी करेगा?

फिलहाल आरोपों की सच्चाई जांच और दस्तावेजी परीक्षण से ही स्पष्ट होगी, लेकिन इतना तय है कि आदिवासी जमीन से जुड़े इस विवाद को अब केवल एक राजस्व शिकायत मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रशासन की निष्पक्ष कार्रवाई और भाजपा संगठन का जवाब—दोनों का इंतजार है।









