पसान-सरकारी सड़क या अवैध रेत खपाने का अड्डा? कोटमी-जटगा मार्ग पर नियमों की खुलेआम धज्जियां! PWD की नाक के नीचे नाली-पुलिया निर्माण में कथित अवैध रेत का इस्तेमाल, खनिज विभाग की चुप्पी पर सवाल

कोरबा। सरकारी निर्माण कार्यों में पारदर्शिता और गुणवत्ता सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी जिन विभागों पर है, उन्हीं की निगरानी में यदि नियमों को ताक पर रखकर निर्माण सामग्री का इस्तेमाल होने लगे तो जवाबदेही किसकी होगी? कोटमी से जटगा तक पहुंच मुख्य मार्ग पर चल रहे सड़क निर्माण कार्य को लेकर ऐसा ही गंभीर मामला सामने आया है। लोक निर्माण विभाग के अंतर्गत कराए जा रहे इस निर्माण में नाली और पुलिया के कार्यों में कथित तौर पर अवैध रेत का खुलेआम इस्तेमाल किए जाने के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय लोगों की शिकायतों ने न केवल ठेकेदार की कार्यप्रणाली बल्कि विभागीय निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
निर्माण स्थल पर रेत की वैधता कौन जांच रहा है?

स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, सड़क निर्माण के दौरान नाली और पुलिया बनाने में जिस रेत का उपयोग किया जा रहा है, उसकी वैधता को लेकर संदेह है। आरोप है कि निर्माण स्थल पर रेत की आपूर्ति और खपत जारी है, लेकिन इसके स्रोत, रॉयल्टी भुगतान और वैध परिवहन दस्तावेजों की जांच को लेकर कोई प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं दे रही है। यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह मामला केवल अवैध खनिज परिवहन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी निर्माण कार्यों में नियमों के पालन और विभागीय जवाबदेही का भी बड़ा सवाल बनेगा।
PWD की निगरानी में निर्माण, फिर जिम्मेदारी से दूरी क्यों?

कोटमी-जटगा मार्ग क्षेत्र के लिहाज से महत्वपूर्ण संपर्क मार्ग है। इस मार्ग पर सड़क के साथ नाली और पुलिया का निर्माण भी कराया जा रहा है। ऐसे कार्यों में निर्माण सामग्री की गुणवत्ता और वैधता सुनिश्चित करना संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है। सवाल यह है कि क्या विभागीय इंजीनियर निर्माण स्थल का नियमित निरीक्षण कर रहे हैं? क्या ठेकेदार द्वारा इस्तेमाल की जा रही रेत के रॉयल्टी दस्तावेज और परिवहन पास का सत्यापन किया गया है? यदि जांच हुई है तो उसका रिकॉर्ड कहां है?
सरकारी पैसे से निर्माण, लेकिन सामग्री के स्रोत पर पर्दा क्यों?

सरकारी निर्माण कार्यों में इस्तेमाल होने वाली प्रत्येक सामग्री का निर्धारित मानकों के अनुरूप होना जरूरी है। रेत की गुणवत्ता और उसकी वैध आपूर्ति दोनों महत्वपूर्ण हैं। निर्माण स्थल पर इस्तेमाल हो रही रेत यदि बिना वैध दस्तावेजों के लाई गई है तो खनिज नियमों के तहत कार्रवाई का प्रश्न उठता है। वहीं यदि निर्माण में निर्धारित गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है तो इसका असर सड़क, नाली और पुलिया की मजबूती पर पड़ सकता है। ऐसे में केवल निर्माण पूरा करा देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता और सामग्री की वैधता की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
खनिज विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में
जिले में रेत के अवैध उत्खनन और परिवहन पर नियंत्रण की जिम्मेदारी खनिज विभाग की है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विभाग को कोटमी-जटगा मार्ग पर चल रहे निर्माण कार्य में रेत के इस्तेमाल की जानकारी है? क्या निर्माण स्थल पर पहुंचकर रेत के स्रोत और परिवहन दस्तावेजों का सत्यापन किया गया? यदि नहीं, तो निर्माण कार्य में इस्तेमाल हो रही रेत की वैधता सुनिश्चित करने के लिए अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
जांच सिर्फ रेत तक सीमित न रहे, पूरे निर्माण की हो पड़ताल
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि कोटमी-जटगा सड़क निर्माण स्थल का तत्काल निरीक्षण कराया जाए। निर्माण में इस्तेमाल हो रही रेत के स्रोत, रॉयल्टी भुगतान, परिवहन दस्तावेज और आपूर्ति करने वालों की जांच की जाए। साथ ही नाली और पुलिया निर्माण में उपयोग की जा रही सामग्री की तकनीकी गुणवत्ता का भी परीक्षण कराया जाए। यदि अवैध रेत के इस्तेमाल या निर्माण गुणवत्ता में गड़बड़ी की पुष्टि होती है तो संबंधित ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
अब विभागों को देना होगा जवाब!
इस पूरे मामले में लोक निर्माण विभाग और खनिज विभाग की जवाबदेही तय होना जरूरी है। आखिर किसकी अनुमति से रेत निर्माण स्थल तक पहुंच रही है? ठेकेदार के पास वैध रॉयल्टी और परिवहन दस्तावेज हैं या नहीं? विभागीय अधिकारियों ने अब तक क्या निरीक्षण किया है? इन सवालों का जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल संबंधित विभागों का आधिकारिक पक्ष सामने नहीं आया है।
सरकारी धन से बनने वाली सड़क जनता की सुविधा के लिए है, किसी ठेकेदार की मनमानी के लिए नहीं। अब देखना यह है कि प्रशासन इस शिकायत को गंभीरता से लेकर जांच कराता है या फिर कोटमी-जटगा मार्ग पर उठ रहे सवाल भी सरकारी फाइलों में दबकर रह जाएंगे।









