मरवाही: निलंबन, आरोप और फिर सधवानी में वापसी! आखिर एक वनरक्षक पर इतनी मेहरबान क्यों हैं डीएफओ ग्रीष्मी चांद?
आखिर एक वनरक्षक पर इतनी विशेष कृपा क्यों?

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। मरवाही वनमंडल इन दिनों एक ऐसे मामले को लेकर चर्चा में है, जिसने विभागीय पारदर्शिता, जवाबदेही और प्रशासनिक निष्पक्षता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला खोड़री परिक्षेत्र के सधवानी बिट और केंद्रीय नर्सरी से जुड़ा है, जहां पदस्थ रहे वनरक्षक राकेश कुमार राठौर का नाम वर्षों से विवादों, शिकायतों और विभागीय कार्रवाई से जुड़ता रहा है। इसके बावजूद संबंधित कर्मचारी की वन विभाग में बनी पकड़ और महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक उसकी पहुंच अब चर्चा का सबसे बड़ा विषय बन गई है।
निरीक्षण में खुली गड़बड़ियों की परतें, फिर हुआ निलंबन

मुख्य वनसंरक्षक बिलासपुर वृत्त प्रभात मिश्रा के निरीक्षण के दौरान खोड़री परिक्षेत्र के कक्ष क्रमांक 2210 में पौधारोपण कार्यों की वास्तविकता सामने आई थी। निरीक्षण में पौधारोपण कार्यों में गंभीर खामियां, रखरखाव में लापरवाही और कई स्थानों पर केवल कागजी वृक्षारोपण जैसी स्थिति पाए जाने के बाद 28 अगस्त 2025 को वनरक्षक राकेश कुमार राठौर को निलंबित किया गया था।
यह कोई पहला मामला नहीं था। इससे पहले भी उनके खिलाफ वृक्षारोपण, नर्सरी प्रबंधन, लकड़ी परिवहन और विभिन्न विभागीय कार्यों में अनियमितताओं की शिकायतें सामने आती रही हैं। स्थानीय स्तर पर भी उनके कार्यकाल को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं।

सबसे बड़ा सवाल—निलंबन के बाद फिर सधवानी में कैसे?
पूरे मामले में सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जिस कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई, वही कर्मचारी फिर सधवानी बिट में वनरक्षक के रूप में कैसे पहुंच गया? आखिर ऐसा कौन सा विशेष कारण था कि कार्रवाई के बाद भी उसकी स्थिति कमजोर होने के बजाय और मजबूत दिखाई दे रही है?

ग्रामीणों और शिकायतकर्ताओं का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में विभागीय जांच और निलंबन झेल चुके कर्मचारी को संवेदनशील जिम्मेदारियों से दूर रखा जाता है, लेकिन यहां तस्वीर बिल्कुल उलट नजर आ रही है।
केंद्रीय नर्सरी पर भी सवालों का साया
सधवानी केंद्रीय नर्सरी मरवाही वनमंडल की सबसे महत्वपूर्ण इकाइयों में से एक मानी जाती है। यहां लाखों पौधों की तैयारी और विभिन्न योजनाओं के लिए पौध उपलब्ध कराने का कार्य होता है। ऐसे में जिस कर्मचारी का नाम पहले से नर्सरी प्रबंधन और पौधारोपण विवादों में सामने आ चुका हो, उसका इस महत्वपूर्ण केंद्र से जुड़ा रहना कई नए सवाल खड़े कर रहा है।
वर्ष 2022 से अब तक केंद्रीय नर्सरी में हुए कार्यों, पौध उत्पादन, वितरण और खर्च की गई राशि का भौतिक सत्यापन कराया जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं।
नरवा योजना, मजदूरी भुगतान और करोड़ों के कामों पर भी आरोप
स्थानीय लोगों का आरोप है कि नरवा विकास योजना, प्लांटेशन कार्यों और मजदूरी भुगतान में भी गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। आरोप लगाए जा रहे हैं कि कई कार्यों में रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत में भारी अंतर है। शिकायतकर्ताओं ने इन सभी मामलों की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच की मांग की है।
हालांकि इन आरोपों की पुष्टि किसी स्वतंत्र एजेंसी द्वारा नहीं हुई है, लेकिन शिकायतों की संख्या और उनकी गंभीरता ने पूरे मामले को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
आखिर एक वनरक्षक पर इतनी विशेष कृपा क्यों?
अब सबसे ज्यादा सवाल मरवाही वनमंडल की डीएफओ की कार्यशैली को लेकर उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों और ग्रामीणों में चर्चा का विषय है कि आखिर ऐसा क्या कारण है कि विवादों, शिकायतों और निलंबन के बावजूद एक ही वनरक्षक पर लगातार भरोसा जताया जा रहा है?
वन विभाग के गलियारों में यह चर्चा भी तेज है कि राकेश राठौर को लगातार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने के पीछे कोई न कोई मजबूत संरक्षण अवश्य है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार संबंधित वनरक्षक विभाग के प्रभावशाली लोगों के करीबी माने जाते हैं। हालांकि इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार सामने आ रहे घटनाक्रम इन चर्चाओं को और हवा दे रहे हैं।
डीएफओ की चुप्पी से बढ़ रहे संदेह
पूरे मामले में सबसे अधिक सवाल इस बात को लेकर उठ रहे हैं कि यदि संबंधित कर्मचारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई हुई थी तो उसे दोबारा महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक पहुंच किस आधार पर मिली? क्या विभाग के पास इसके समर्थन में कोई स्पष्ट कारण और रिकॉर्ड मौजूद है? यदि है तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
डीएफओ की ओर से अब तक कोई स्पष्ट जवाब सामने नहीं आने से संदेह और गहराता जा रहा है। चुप्पी जितनी लंबी होगी, सवाल उतने ही बड़े होते जाएंगे।
जांच हुई तो कई चेहरे बेनकाब होने का दावा
ग्रामीणों का कहना है कि यदि सधवानी केंद्रीय नर्सरी, पौधारोपण कार्यों, नरवा योजना, मजदूरी भुगतान, विभागीय कार्रवाई और पुनः पदस्थापना से जुड़े सभी दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच करा दी जाए तो कई ऐसे तथ्य सामने आ सकते हैं जो पूरे वनमंडल को हिला सकते हैं।
अब निगाहें वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों पर हैं। सवाल सिर्फ राकेश राठौर का नहीं है, सवाल यह है कि क्या मरवाही वनमंडल में नियमों से बड़ा किसी का संरक्षण है? और यदि नहीं, तो फिर एक ही वनरक्षक पर इतनी विशेष कृपा आखिर क्यों?
(नोट: समाचार में उल्लेखित आरोप शिकायतकर्ताओं, ग्रामीणों और स्थानीय सूत्रों के दावों पर आधारित हैं। संबंधित वनरक्षक, डीएफओ मरवाही एवं वन विभाग का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)









