शिवप्रकाश–तत्कालीन पटवारी मोहन राम दिवाकर की कथित जुगलबंदी से ‘फर्जी चौहद्दी’ का खेल? 50 साल पुराने सरकारी निर्माण के बीच जमीन रजिस्ट्री पर बड़ा सवाल
पसान में ‘फर्जी चौहद्दी’ के आरोप से खुला राजस्व खेल—रजिस्ट्री से नामांतरण और डायवर्सन तक पटवारी की भूमिका पर गंभीर सवाल

‘फर्जी चौहद्दी’ से रजिस्ट्री का खेल? शिवप्रकाश कुशराम और तत्कालीन पटवारी मोहन राम दिवाकर की कथित मिलीभगत पर गंभीर सवाल!
पसान/कोरबा। पसान तहसील के ग्राम पसान में खसरा नंबर 187/3 एवं 187/5, रकबा क्रमशः 0.0650 एवं 0.105 हेक्टेयर भूमि को लेकर ऐसा विवाद सामने आया है, जिसने राजस्व महकमे की कार्यप्रणाली पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। शिवप्रकाश कुशराम द्वारा अपनी निजी भूमि पर शासकीय निर्माण का आरोप लगाए जाने के बाद अब उसी जमीन की रजिस्ट्री से लेकर चौहद्दी, नामांतरण और डायवर्सन तक की पूरी प्रक्रिया सवालों के घेरे में है। सूत्रों के हवाले से आरोप है कि तत्कालीन घोटालेबाज पटवारी मोहन राम दिवाकर की भूमिका में कथित अनियमितता हुई और कथित रूप से ऐसी चौहद्दी तैयार की गई, जिसके आधार पर रजिस्ट्री का रास्ता साफ हुआ। यही आरोप अब इस पूरे मामले की सबसे बड़ी जांच की वजह बन गया है।

फर्जी चौहद्दी बनी तो रजिस्ट्री कैसे हुई?
मामले का सबसे बड़ा सवाल यही है—यदि चौहद्दी ही कथित रूप से गलत थी, तो उसी के आधार पर जमीन की रजिस्ट्री आखिर कैसे हो गई? क्या रजिस्ट्री से पहले मौके का सत्यापन किया गया था? क्या पटवारी की रिपोर्ट और वास्तविक स्थल की स्थिति का मिलान हुआ था? और यदि मौके पर पहले से शासकीय निर्माण मौजूद था, तो चौहद्दी तैयार करते समय उसका उल्लेख क्यों नहीं हुआ? इन सवालों के जवाब सामने आए बिना पूरी रजिस्ट्री प्रक्रिया पर उठे संदेह खत्म नहीं हो सकते।

‘दलाल’ की भूमिका का आरोप, पटवारी पर भी सवालों की बौछार
सूत्रों के अनुसार शिवप्रकाश कुशराम और तत्कालीन पटवारी मोहन राम दिवाकर के बीच कथित नजदीकी संबंधों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप यहां तक हैं कि शिवप्रकाश ने कथित तौर पर पटवारी के प्रभाव और संपर्क का इस्तेमाल करते हुए जमीन संबंधी प्रक्रिया आगे बढ़ाई। इसी वजह से कुछ लोग शिवप्रकाश की भूमिका को कथित ‘दलाल’ के रूप में देख रहे हैं। हालांकि यह आरोप जांच का विषय है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। यदि दोनों के बीच किसी प्रकार का अनुचित समन्वय था, तो संबंधित अवधि के राजस्व रिकॉर्ड और पटवारी की कार्यवाही इसकी असली तस्वीर सामने ला सकती है।

‘घोटालेबाज पटवारी’ का तमगा या महज आरोप? जांच से होगा फैसला
मोहन राम दिवाकर की भूमिका को लेकर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। कथित फर्जी चौहद्दी तैयार करने से लेकर उसके आधार पर आगे बढ़ी प्रक्रिया तक उनकी भूमिका की जांच की मांग उठना स्वाभाविक है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या पटवारी ने अपने पद का दुरुपयोग किया? क्या चौहद्दी वास्तविक स्थल के अनुरूप थी? क्या किसी पक्ष को अनुचित लाभ पहुंचाया गया? यदि जांच में दस्तावेजी तौर पर गड़बड़ी सामने आती है, तो जिम्मेदारी तय होना जरूरी होगा। फिलहाल उन्हें “घोटालेबाज” कहना आरोप से आगे बढ़कर निष्कर्ष होगा, इसलिए इसकी पुष्टि जांच से ही होनी चाहिए।
सरकारी स्कूल और आंगनबाड़ी के बीच निजी जमीन की कहानी कैसे बनी?
मामले को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि शिकायत से जुड़े विवरण के अनुसार संबंधित स्थल पर लंबे समय से शासकीय कन्या शाला और आंगनबाड़ी भवन मौजूद रहे हैं। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जिस समय चौहद्दी तैयार की गई, उस समय पटवारी को मौके की स्थिति की जानकारी थी या नहीं। यदि सरकारी भवन मौके पर मौजूद थे, तो क्या उन्हें चौहद्दी में दर्शाया गया? अगर नहीं, तो क्यों? और यदि दर्शाया गया था, तो फिर उसी भूमि की निजी रजिस्ट्री की प्रक्रिया कैसे आगे बढ़ी?
शिवप्रकाश की शिकायत ने खोला वही दरवाजा, जिसकी जांच अब उन पर भी लौट रही है
शिवप्रकाश कुशराम ने आरोप लगाया कि उनकी निजी भूमि पर शासकीय आंगनबाड़ी का निर्माण कराया जा रहा है। लेकिन उनकी शिकायत के बाद मामला सिर्फ निर्माण रोकने तक सीमित नहीं रहा। अब सवाल यह भी है कि जिस जमीन को वे अपनी निजी संपत्ति बता रहे हैं, उसकी खरीद के समय भूमि की वास्तविक स्थिति क्या थी और रजिस्ट्री के लिए कौन-कौन से दस्तावेज इस्तेमाल हुए? यदि मौके पर वर्षों से सरकारी निर्माण मौजूद था, तो भूमि खरीदने से पहले उसका सत्यापन किसने किया और किस आधार पर किया गया?
चौहद्दी से रजिस्ट्री, रजिस्ट्री से नामांतरण और फिर डायवर्सन—किसने खोला रास्ता?
पूरे मामले की जांच किसी एक दस्तावेज तक सीमित नहीं होनी चाहिए। खसरा 187/3 और 187/5 की मूल स्थिति, चौहद्दी तैयार करने की प्रक्रिया, रजिस्ट्री दस्तावेज, नामांतरण आदेश, डायवर्सन प्रकरण और मौके की वर्तमान स्थिति—सभी का आपस में मिलान होना चाहिए। तभी यह स्पष्ट होगा कि कहीं दस्तावेजों और जमीन की वास्तविक स्थिति के बीच कोई गंभीर अंतर था या नहीं।
अब असली सवाल—कागज सही या जमीन की हकीकत?
एक तरफ शिवप्रकाश अपनी भूमि पर शासकीय निर्माण का आरोप लगा रहे हैं, दूसरी तरफ उसी भूमि की पुरानी स्थिति और रजिस्ट्री प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में प्रशासन के सामने सीधा सवाल है—आखिर खसरा 187/3 और 187/5 की वास्तविक वैधानिक स्थिति क्या है? यदि जमीन निजी है तो शासकीय निर्माण किस आधार पर हुआ? और यदि जमीन शासकीय उपयोग की थी तो निजी रजिस्ट्री, नामांतरण और डायवर्सन कैसे हुआ?
जांच हुई तो कई चेहरों से उठ सकता है पर्दा
अब जरूरत केवल औपचारिक जांच की नहीं, बल्कि मूल राजस्व रिकॉर्ड, पुरानी चौहद्दी, स्थल निरीक्षण, रजिस्ट्री दस्तावेज और नामांतरण-डायवर्सन की पूरी फाइल खंगालने की है। अगर ‘फर्जी चौहद्दी’ का आरोप सही निकलता है तो यह सवाल भी सामने आएगा कि उस कथित गलत दस्तावेज को आगे की प्रक्रिया में किस-किस स्तर पर स्वीकार किया गया। वहीं यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं तो प्रशासन को भी साफ-साफ बताना होगा कि विवादित भूमि की वास्तविक स्थिति क्या है।
फिलहाल पसान की यह जमीन सिर्फ एक भूमि विवाद नहीं, बल्कि राजस्व रिकॉर्ड की विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुकी है। ‘फर्जी चौहद्दी’ का आरोप, रजिस्ट्री की प्रक्रिया, शिवप्रकाश की भूमिका और तत्कालीन पटवारी मोहन राम दिवाकर पर लगे गंभीर आरोप—इन सभी की निष्पक्ष जांच ही बताएगी कि इस जमीन की कहानी में आखिर सच क्या है और कथित खेल कितना बड़ा।
नोट: खबर में उल्लिखित आरोप शिकायत एवं सूत्रों से प्राप्त जानकारी पर आधारित हैं। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रकाशित किया जाना चाहिए।









