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कोरबा: सिस्टम की बेरुखी: दिव्यांग महिला को मोटराइज्ड ट्राईसाइकिल के लिए 1 साल से इंतजार, दफ्तरों के चक्कर में घिस गई उम्मीदें

जनपद से जिला पंचायत तक सिर्फ आश्वासन, परिजनों के सहारे चल रही जिंदगी

कोरबा/पाली। सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में सुस्ती और लालफीताशाही का एक और चिंताजनक मामला सामने आया है। जरूरतमंद हितग्राहियों को समय पर लाभ नहीं मिलने की हकीकत एक बार फिर उजागर हुई है। पाली जनपद क्षेत्र के ग्राम पोड़ी की रहने वाली दिव्यांग महिला संतोषी उरांव बीते एक साल से मोटराइज्ड ट्राईसाइकिल के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही है, लेकिन उसे अब तक केवल आश्वासन ही मिला है।

जानकारी के अनुसार, संतोषी उरांव दोनों पैरों से पूर्णतः दिव्यांग है। करीब चार साल पहले उसे शासन की योजना के तहत मोटराइज्ड ट्राईसाइकिल मिली थी, जो अब पूरी तरह खराब हो चुकी है। इसके बाद उसने एक वर्ष पूर्व नई ट्राईसाइकिल के लिए जनपद पंचायत में आवेदन किया। सभी जरूरी दस्तावेज, जिनमें दिव्यांगता प्रमाण पत्र भी शामिल है, जमा करने के बावजूद आज तक उसे योजना का लाभ नहीं मिल सका।

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संतोषी का कहना है कि वह कई बार जनपद पंचायत कार्यालय पहुंची, लेकिन हर बार अधिकारियों ने “ट्राईसाइकिल उपलब्ध नहीं है” कहकर उसे लौटा दिया। तीन महीने पहले उसने जिला पंचायत अध्यक्ष से भी गुहार लगाई। अध्यक्ष ने दस्तावेज लेकर जल्द सहायता दिलाने का भरोसा तो दिया, लेकिन वह भरोसा अब तक हकीकत में नहीं बदल सका।

परिजनों के सहारे जिंदगी, बढ़ी परेशानियां

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मोटराइज्ड ट्राईसाइकिल नहीं मिलने से संतोषी की रोजमर्रा की जिंदगी बेहद कठिन हो गई है। उसे कहीं आने-जाने के लिए परिजनों पर निर्भर रहना पड़ता है। कई बार परिवार के लोग उसे पीठ पर उठाकर ले जाने को मजबूर होते हैं। इससे न केवल उसकी आजीविका प्रभावित हो रही है, बल्कि उसका सामाजिक जीवन भी सीमित होता जा रहा है।

नियमों के बावजूद राहत नहीं

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सरकारी प्रावधानों के अनुसार 40 प्रतिशत दिव्यांगता पर सामान्य ट्राईसाइकिल और 80 प्रतिशत या उससे अधिक दिव्यांगता होने पर मोटराइज्ड ट्राईसाइकिल उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इसके बावजूद पात्र हितग्राही को समय पर लाभ नहीं मिलना प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

जवाबदेही पर उठे सवाल

यह मामला सिर्फ एक महिला की परेशानी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की उदासीनता का उदाहरण बन गया है। जनपद से लेकर जिला पंचायत तक केवल आश्वासन का सिलसिला जारी है, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस पहल नजर नहीं आ रही।

अब बड़ा सवाल यही है—क्या जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि सिर्फ आश्वासन देने तक सीमित रहेंगे, या फिर संतोषी उरांव जैसी जरूरतमंद महिला को उसका हक समय पर दिलाने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा?

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