जीपीएम / कोरबा: पसान से दमदम तक रेत माफिया का ‘सिंडिकेट’: सोन नदी को छलनी कर रचा जा रहा अवैध साम्राज्य; वन विभाग के अफसरों पर ‘महीने की बंधी रकम’ लेने का संगीन आरोप?
पसान-साड़ामार के माफिया और वन तंत्र की 'तिगड़ी

कोरबा/गौरेला पेंड्रा मरवाही – मानसून की पाबंदी के बीच जीपीएम और कोरबा जिले की सीमाओं पर फल-फूल रहा अवैध रेत का कारोबार महज एक आम चोरी नहीं, बल्कि अंतर-जिले में फैला एक सुव्यवस्थित ‘सिंडिकेट’ है। इस पूरे काले खेल की परतें जैसे-जैसे खुल रही हैं, प्रशासनिक तंत्र और वन विभाग की सांठगांठ का बेहद खौफनाक व शर्मनाक चेहरा सामने आ रहा है।
सूत्रों से मिले सनसनीखेज खुलासों के अनुसार, सकोला तहसील के दमदम क्षेत्र में डंप रेत का विशाल पहाड़ असल में पसान क्षेत्र के साड़ामार स्थित सोन नदी के सीने को चीरकर निकाला जा रहा है—जो सीधे तौर पर वन विभाग (Forest Department) के संरक्षित क्षेत्र में आता है!

पसान-साड़ामार के माफिया और वन तंत्र की ‘तिगड़ी’
इस अवैध नेटवर्क को चलाने में पसान और साड़ामार के कुख्यात रेत माफिया मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन सबसे चौंकाने वाला मोड़ यह है कि जिन्हें जंगल और नदियों की सुरक्षा का जिम्मा मिला है, वही इस सिंडिकेट के मुख्य सूत्रधार बने बैठे हैं।

डिप्टी रेंजर पर गंभीर आरोप: पसान के डिप्टी रेंजर ईश्वर दास मानिकपुरी की प्रत्यक्ष संलिप्तता और मिलीभगत की बातें खुलकर सामने आ रही हैं। आरोप हैं कि माफिया से ‘महीने की मोटी रकम’ (हफ़्तेदारी/अवैध वसूली) बांध दी गई है, जिसके एवज में वन क्षेत्र में बेधड़क पोकलेन व जेसीबी मशीनें उतारी जा रही हैं।
मातीनदाई बैरियर पर ‘चौकीदार ही बना साझेदार’: पसान से जीपीएम (दमदम) की ओर जाने वाले मुख्य रास्ते पर स्थित मातीनदाई बैरियर पर तैनात वन विभाग के कर्मचारी माफिया के लिए ‘सुरक्षा कवच’ बने हुए हैं। रात-दिन रेत से ओवरलोड होकर गुजरने वाले ट्रैक्टरों को रोकने के बजाय बैरियर पर बैठे कर्मचारी अपनी जेबें गर्म कर उन्हें हरी झंडी दिखा रहे हैं।

त्रिकोणीय सिंडिकेट: पसान के माफिया + साड़ामार के खननकर्ता + वन विभाग के नुमाइंदे—इस तिगड़ी ने मिलकर कानून व्यवस्था को पूरी तरह पंगु बना दिया है।
सोन नदी से दमदम तक: कैसे चलता है यह पूरा ‘ब्लैक नेटवर्क’?
1. उत्खनन (Extraction): पसान के साड़ामार स्थित सोन नदी (वन परिक्षेत्र) से रोजाना दर्जनों ट्रैक्टर व गाड़ियां अवैध रूप से रेत निकालती हैं।
2. परिवहन (Transport): मातीनदाई बैरियर के कर्मचारियों की आंखों के सामने से यह अवैध खेप गुजरती है, जहाँ कोई जांच या कागजात नहीं मांगे जाते।
3. भंडारण (Storage): इस अवैध रेत को जीपीएम जिले के कोटमी तहसील अंतर्गत दमदम क्षेत्र में लाकर बिना किसी वैलिड ‘स्टोरेज परमिट’ के विशाल पहाड़ों के रूप में डंप कर दिया जाता है।
जलते सवाल: क्या सिर्फ़ ट्रैक्टर पकड़ना काफ़ी है या ‘आकाओं’ पर गिरेगी गाज़?
जब सोन नदी वन विभाग के अधीन आती है, तो डिप्टी रेंजर ईश्वर दास मानिकपुरी और क्षेत्रीय कर्मचारियों की नजरों से सैकड़ों ट्रिप रेत कैसे ओझल हो रही है?
क्या मातीनदाई बैरियर पर लगे सीसीटीवी या रजिस्टर की निष्पक्ष जांच होगी, जिससे साफ हो सके कि प्रतिदिन कितने अवैध वाहन वहां से पार हुए?
जिला प्रशासन और खनिज विभाग की कार्रवाई क्या केवल रेत ढोने वाले चालकों तक सीमित रहेगी, या इस सिंडिकेट को संरक्षण देने वाले पसान के वन अधिकारियों और माफिया आकाओं को भी जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाएगा?









