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KORBA: 12 नंबर बढ़ाए… सिस्टम को ठगा और 17 साल तक खाते रहे सरकारी वेतन?फर्जी मार्कशीट से शिक्षक बनने का आरोप, शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल

जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कोरबा द्वारा जारी आरोप पत्र ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया

कोरबा। छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में शिक्षा विभाग का एक ऐसा कथित फर्जीवाड़ा सामने आया है जिसने पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोप है कि एक शिक्षक ने 12वीं की अंकसूची में सिर्फ 12 अंक बढ़ाकर सरकारी नौकरी हासिल कर ली और करीब 17 साल तक शासन को चूना लगाते हुए लाखों रुपये का वेतन उठाते रहे।

मामला कोरबा विकासखंड के शासकीय प्राथमिक शाला डिलाडेरा में पदस्थ प्रधान पाठक दिलीप कुमार कुर्रे से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि वास्तविक अंक 254/450 थे, लेकिन नौकरी पाने के लिए कथित तौर पर अंक बढ़ाकर 266/450 कर दिए गए। हैरानी की बात यह है कि इतने वर्षों तक विभागीय जांच, सत्यापन और सेवा रिकॉर्ड के बावजूद यह खेल चलता रहा।जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कोरबा द्वारा जारी आरोप पत्र ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है। नियुक्ति के समय जमा दस्तावेज और सर्विस बुक में अंतर मिलने के बाद अब शिक्षा विभाग कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है।

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सवाल सिर्फ एक शिक्षक पर नहीं, पूरे सिस्टम पर है

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर 2007 से अब तक यह कथित फर्जीवाड़ा अधिकारियों की नजरों से कैसे बचा रहा? क्या हर बार दस्तावेज सत्यापन सिर्फ खानापूर्ति बनकर रह गया? या फिर विभाग के भीतर बैठे कुछ लोगों का संरक्षण इस खेल को बचाता रहा? यदि आरोप सही हैं तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि भर्ती प्रक्रिया, सत्यापन तंत्र और प्रशासनिक जवाबदेही की खुली पोल है। योग्य अभ्यर्थी बेरोजगार घूमते रहे और कथित फर्जी अंकसूची वाला व्यक्ति वर्षों तक सरकारी वेतन लेता रहा।

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“फर्जी गुरुजी” पर कब चलेगा डंडा?

शिकायतकर्ता जितेंद्र कुमार साहू ने मुख्यमंत्री और लोकायुक्त से शिकायत कर तत्काल बर्खास्तगी, वेतन वसूली और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की है।

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अब सवाल यह है कि क्या शिक्षा विभाग सिर्फ नोटिस जारी कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेगा? या फिर वाकई कठोर कार्रवाई होगी? क्योंकि अगर डीईओ की रिपोर्ट के बाद भी मामला ठंडे बस्ते में गया तो इसे भ्रष्टाचार को खुला संरक्षण माना जाएगा।शिक्षा के मंदिर में यदि फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी पाने वाले बैठे हैं तो यह केवल विभाग नहीं, पूरी व्यवस्था पर कलंक है। अब निगाहें सरकार और स्कूल शिक्षा विभाग पर टिकी हैं कि “फर्जी अंक” के इस खेल पर आखिर कब तक पर्दा डाला जाएगा।

A Pranav

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