माफिया राज! कटघोरा में पुल के नीचे ‘नदी का सीना’ चीर रहे रेत चोर, माइनिंग विभाग की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ के पीछे क्या है खेल?
रात 10 बजते ही अहिरन नदी पर शुरू होता है 'लूटतंत्र', पुलिस की गश्त और माइनिंग नाका सिर्फ दिखावा?

कोरबा-कटघोरा। कटघोरा में कानून का इकबाल खत्म हो चुका है और रेत माफियाओं का राज चल रहा है! जिला प्रशासन और खनिज विभाग की नाक के नीचे प्राकृतिक संसाधनों की ऐसी डकैती शायद ही कहीं देखने को मिले। कटघोरा थाना क्षेत्र के जुराली और नया पुल बाईपास घाट पर जो कुछ हो रहा है, वह सिर्फ अवैध उत्खनन नहीं, बल्कि सीधे तौर पर सरकारी सिस्टम को खुली चुनौती है। अहिरन नदी के पुल के ठीक नीचे से हर रात बेखौफ होकर रेत का अवैध उत्खनन और परिवहन किया जा रहा है, और सबसे शर्मनाक बात यह है कि यह पूरा खेल माइनिंग विभाग के नाके के ठीक सामने चल रहा है!
‘सन्नाटा’ होते ही जागते हैं रेत के सौदागर!

जैसे ही रात के 10 बजते हैं और आम जनता अपने घरों में सो जाती है, वैसे ही कटघोरा के रेत माफिया अपनी पूरी फौज के साथ सक्रिय हो जाते हैं। अंधेरे की आड़ में दर्जनों ट्रैक्टर अहिरन नदी के सीने पर काल बनकर उतरते हैं। बिना किसी खौफ के, बिना किसी अनुमति के, रात भर नदी को खोदा जाता है। माफियाओं के हौसले इतने बुलंद हैं कि उन्हें न तो पुलिस का डर है और न ही प्रशासन का।
नाका प्रभारी पर ‘सेटिंग’ के गंभीर आरोप: क्या बट रहा है ‘मलाई’ का हिस्सा?

आखिर माइनिंग विभाग इस कदर अंधा, बहरा और गूंगा क्यों बना हुआ है? स्थानीय स्तर पर यह चर्चा जोरों पर है कि रेत माफियाओं ने माइनिंग विभाग के नाके को ‘मोटी रकम’ देकर पूरी तरह से मैनेज कर लिया है। जब रक्षक ही भक्षक बन जाए, तो कानून की रक्षा कौन करेगा? रात के अंधेरे में जब ट्रैक्टरों का काफिला शहर के मुख्य चौराहों से होकर गुजरता है, तो गश्त करने वाली पुलिस और माइनिंग के अफसरों को सांप क्यों सूंघ जाता है? क्या यह अंधापन किसी बड़ी मिलीभगत और ‘ऊपर तक’ जाने वाले हिस्से की तरफ इशारा नहीं करता?
बड़े प्रोजेक्ट्स की आड़ में ‘अवैध’ का धंधा

नदी की छाती फाड़कर निकाली जा रही यह अवैध रेत कोई चोरी-छिपे नहीं बेची जा रही। इस अवैध रेत को क्षेत्र में चल रहे रेलवे के बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स, सरकारी निर्माण कार्यों और निजी साइटों पर धड़ल्ले से खपाया जा रहा है। यानी सरकारी पैसे से बनने वाले प्रोजेक्ट्स में अवैध रेत का इस्तेमाल कर सरकार के ही राजस्व को चूना लगाया जा रहा है।
…तो क्या किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है प्रशासन?
यह सिर्फ पर्यावरण की तबाही नहीं है, बल्कि इंसानी जिंदगियों से खिलवाड़ भी है। पुल के ठीक नीचे से लगातार रेत निकालने के कारण पुल के पिलर्स (खंभे) खोखले हो रहे हैं। नदी के पुल के अस्तित्व पर सीधा खतरा मंडरा रहा है। कल को अगर कोई बड़ा हादसा हुआ और पुल ढह गया, तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा? क्या तब माइनिंग विभाग और जिला प्रशासन अपनी कुंभकर्णी नींद से जागेगा?









