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शर्मसार करता समाज : 11 साल से जिंदा लाश बना परिवार, प्रेम विवाह की मिली मौत से बदतर सजा

अंतर्जातीय विवाह पर हुक्का-पानी बंद, मृत्युभोज भी जीते जी खा गए.

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कोरबा/पाली:-21वीं सदी में डिजिटल इंडिया और ‘बेटी पढ़ाओ- बेटी बचाओ’ के नारों के बीच छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले से इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां प्रेम विवाह करना एक परिवार के लिए जिंदगी भर का अभिशाप बन गया। 11 साल से एक हंसते- खेलते परिवार को समाज ने जिंदा लाश बनाकर छोड़ दिया है। जहां प्यार की कीमत 11 साल का सामाजिक वनवास के रूप में यह परिवार काट चुका है।

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ग्राम पोड़ी, थाना पाली निवासी अशोक कुमार प्रजापति ने 4 जुलाई 2015 को मनीषा कंवर से प्रेम विवाह किया। कानून की नजर में तब दोनों बालिग थे और संविधान ने भी हक दिया था। पर समाज के ठेकेदारों को ये रास नहीं आया। गांव में पंचायत बैठी और फरमान सुना दिया सामाजिक बहिष्कार का। उस दिन से आज तक यानी पूरे 11 साल से अशोक और उसके परिवार का हुक्का- पानी बंद है। समाज के लिए वो मर चुके हैं। इतना ही नहीं पीड़ित परिवार के द्वारा थाना एवं एसडीएम को दिए आवेदन में दर्द छलकता लेख है कि समाज के लोगों द्वारा मेरा मृत्युभोज मेरे जीते जी खा लिया गया।

जरा सोचिए, जीते जी किसी का मृत्युभोज खा लेना कितना बड़ा कलंक है इस समाज पर। यह घटना किसी अनपढ़, पिछड़े गांव की नहीं है, बल्कि शिक्षित समाज का दोहरा चरित्र है। समाज के विपरीत कार्य या निर्णय पर सामाजिक दंड का अधिकार है, लेकिन ऐसा नही कि एक परिवार को 11 साल से बहिष्कृत रखा जाए। आरोपियों की सूची में 20 से ज्यादा नाम का उल्लेख किया गया हैं जो पाली, रतनपुर, बिलासपुर, मस्तूरी, जांजगीर- चांपा तक फैले हैं।

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यानी पढ़े- लिखे शहरी कस्बों से जुड़े लोग इस कुरीति के संचालक हैं। एक तरफ हम संविधान की दुहाई देते हैं, दूसरी तरफ जाति के नाम पर किसी की सांसें छीन लेते हैं। क्या यही है हमारा शिक्षित समाज? बहिष्कार की क्रूरता यहीं खत्म नहीं होती। आवेदन के मुताबिक परिवार को शादी, गमी, तीज- त्योहार से तो दूर रखा ही गया है, माता- पिता से मिलने तक पर प्रतिबंध लगा दिया। एक बेटे को उसके मां- बाप से, एक पोते को दादा- दादी से मिलने नहीं दिया जा रहा। इससे बड़ी अमानवीयता क्या होगी? पीड़ित का आरोप और भी संगीन है। बहिष्कार के बाद समाज के पदाधिकारियों ने मोटी रकम लेकर वापस शामिल करने की बात कही है।

यानी इंसानियत की कीमत लगाई गई। पैसा दो तो जाति पवित्र, नहीं तो बहिष्कृत। यह सीधे- सीधे उगाही और मानसिक प्रताड़ना है। सुप्रीम कोर्ट साफ कह चुका है कि दो बालिगों को अपनी मर्जी से शादी करने का हक है। नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम 1955 के तहत सामाजिक बहिष्कार गैर- कानूनी है। फिर भी कोरबा के इस गांव में खाप पंचायत जैसी मानसिकता 11 साल से संविधान को मुंह चिढ़ा रही है। 11 साल तक घुट- घुट कर जीने के बाद आखिरकार अशोक कुमार प्रजापति ने 29 मई 2026 को थाना प्रभारी एवं एसडीएम पाली के सामने न्याय की गुहार लगाई है और आवेदन में लिखा है- आज हमारी अवस्था जीवन मरण की बनी हुई है। जब समाज जीते जी मार दे, तो इंसान जाए भी कहां?

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सवाल समाज से
क्या प्रेम करना इतना बड़ा गुनाह है कि 11 साल तक पूरे परिवार को तिल- तिल मरने दिया जाए? जो समाज बेटी बचाओ का नारा लगाता है, वही समाज एक बेटी को बहू बनाकर लाने पर परिवार को उजाड़ क्यों देता है? पढ़- लिखकर भी अगर हम जाति की जंजीरें नहीं तोड़ पाए, तो हमारी शिक्षा का क्या फायदा? बहरहाल सामाजिक बहिष्कार का दंश झेल रहे पीड़ित परिवार ने पुलिस और एसडीएम से फरियाद लगाते हुए उचित कार्रवाई कर समाज मे स्थान दिलाने मांग की है ताकि यह परिवार सामान्य जीवन जी सके। पर सवाल सिर्फ पुलिस से नहीं, हमसे- आपसे है। क्या हम ऐसे शिक्षित- अशिक्षित समाज का हिस्सा बने रहेंगे जहां प्यार की सजा मौत से भी बदतर हो?

A Pranav

professional journalist

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