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दागी जाखड़’ को कोरबा में VIP ट्रीटमेंट पर भड़का जनता का गुस्सा: नेताओं के लिए अलग संविधान और आम जनता के लिए अलग कानून क्यों?

जनता की अदालत का सीधा सवाल: ललिता कुमारी जजमेंट की धज्जियां उड़ाती खाकी!

कोरबा। क्या कोरबा जिले में न्याय की तराजू सत्ता के रसूख को देखकर डगमगा जाती है? क्या खाकी का खौफ सिर्फ आम जनता, गरीबों और बेबसों के लिए रह गया है? यह वो आक्रोशित सवाल हैं जो इस वक्त कोरबा की जागरूक जनता पुलिस प्रशासन के दोहरे रवैये को देखकर खुलेआम पूछ रही है।

पसान के रसूखदार भाजपा नेता और जनपद उपाध्यक्ष प्रकाश चंद्र जाखड़ पर एक महिला ने घर में घुसकर आबरू पर हाथ डालने जैसा संगीन आरोप लगाया है, लेकिन शर्मनाक बात यह है कि घटना के 6 दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस ने एफआईआर (FIR) दर्ज नहीं की है।

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सुलगते सवाल: क्या कोरबा पुलिस हर मामले में पहले ‘जांच’ का ढोंग करती है?

इसी कोरबा जिले में हर महीने महिलाओं से संबंधित छेड़खानी के दर्जनों मामले सामने आते हैं, जहाँ पुलिस बिना वक्त गंवाए तुरंत एक्शन मोड में आ जाती है। लेकिन जैसे ही आरोपी की जगह सत्ताधारी दल का कोई ‘वीआईपी’ नेता आता है, कानून की धाराएं और नियम अचानक बदल जाते हैं। कटघोरा अनुभाग के जिम्मेदार पुलिस अधिकारी (SDOP) का रटा-रटाया बयान आता है कि “जांच जारी है, जांच के बाद कार्रवाई होगी।”

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इस लचर दलील पर जनता अब पुलिस प्रशासन से सीधे 3 तीखे सवाल पूछ रही है:

 सवाल 1: क्या हर आम नागरिक को यह वीआईपी सुविधा मिलती है?

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यदि आज किसी आम आदमी या गरीब मजदूर पर किसी महिला से छेड़छाड़ का आरोप लगा होता, तो क्या कोरबा पुलिस 6 दिनों तक “जांच जारी है” का राग अलापती? या फिर उसे तुरंत कॉलर पकड़कर लॉकअप के पीछे डाल दिया जाता?

 सवाल 2: क्या पुलिस की प्राथमिक जांच का नियम केवल ‘नेताओं’ के लिए है?

क्या कोरबा पुलिस महिला उत्पीड़न के हर मामले में पहले 4-5 दिनों तक प्राथमिक जांच की औपचारिकता पूरी करती है और फिर एफआईआर लिखती है? जवाब है— बिल्कुल नहीं! आम मामलों में तुरंत कायमी होती है, तो फिर इस दागी नेता के मामले में यह “स्पेशल ट्रीटमेंट” क्यों?

 सवाल 3: सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सरेआम धज्जियां क्यों?

देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) का ऐतिहासिक ‘ललिता कुमारी जजमेंट’ साफ और कड़े शब्दों में कहता है कि महिला संबंधी गंभीर अपराधों में पुलिस को अपनी मर्जी चलाने या ‘जांच’ के नाम पर एफआईआर रोकने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। तो क्या कोरबा की पुलिस खुद को देश की सबसे बड़ी अदालत और संविधान से भी ऊपर मान चुकी है?

पर्दे के पीछे का खेल: ‘जांच’ की आड़ में आरोपी नेता को बचाने की साजिश?

कानून के जानकारों और आम जनता का साफ मानना है कि महिला संबंधी गंभीर अपराधों में एफआईआर दर्ज न करके ‘जांच’ की बात कहना सीधे तौर पर आरोपी को फायदा पहुँचाने की फिक्सिंग है।
पीड़िता को ‘मैनेज’ करने का खुला समय: पीड़िता ने अपनी शिकायत में पहले ही साफ लिखा है कि आरोपी प्रकाश चंद्र जाखड़ अपने प्रशासनिक रसूख (एसडीएम, तहसीलदार) की धौंस दिखाकर पूरे परिवार को बर्बाद करने की धमकी दे रहा है।

पुलिस की चुप्पी पर गहरा संदेह: एफआईआर दर्ज करने में की जा रही यह अवैध देरी साफ इशारा करती है कि पर्दे के पीछे डरे-सहमे पीड़ित परिवार पर दबाव बनाने, उन्हें तोड़ने और मामले को ठंडे बस्ते में डालने के लिए आरोपी नेता को खुला समय और संरक्षण दिया जा रहा है।

साख बचाने के लिए केवल ‘तबादला’ काफी नहीं, जनता को चाहिए न्याय!

मामले को तूल पकड़ता देख जिला पुलिस कप्तान सिद्धार्थ तिवारी ने महिला थाना प्रभारी और पसान प्रभारी को हटाकर ‘प्रशासनिक सर्जरी’ का डैमेज कंट्रोल तो कर दिया है, लेकिन मूल मुद्दा आज भी वहीं का वहीं खड़ा है। जब तक नए अधिकारी चार्ज लेते ही इस दागी नेता के खिलाफ तत्काल एफआईआर दर्ज कर उसकी गिरफ्तारी नहीं करते, तब तक जनता का इस पुलिसिया न्याय प्रणाली से भरोसा पूरी तरह उठा रहेगा।

खौफनाक है पुराना रिकॉर्ड:

आरोपी का पुराना आपराधिक रिकॉर्ड आरोप (फरवरी 2026 का सुखरी तालाब ‘रेप-मर्डर’ कांड) पहले ही बेहद खौफनाक रहा है। ऐसे खूंखार और आदतन अपराधी को पुलिस द्वारा दिया जा रहा यह ‘अवैध लाड-प्यार’ कोरबा पुलिस के दामन पर एक ऐसा दाग है, जिसका जवाब देना अब आला अधिकारियों के लिए भारी पड़ रहा है।

जनता टकटकी लगाए देख रही है कि इस महा-मुद्दे पर कानून अपना काम करता है या फिर हमेशा की तरह सत्ता का रसूख और खाकी का संरक्षण भारी पड़ता है!

 

A Pranav

professional journalist

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