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सुप्रीम कोर्ट के आदेश को कोरबा पुलिस ने डाला डस्टबिन में! BJP नेता को बचाने ‘ललिता कुमारी जजमेंट’ की सरेआम हत्या, 4 दिन बाद भी नो FIR!

कोरबा। क्या कोरबा पुलिस खुद को देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) से भी ऊपर समझने लगी है? क्या सत्ताधारी दल के एक दागी नेता को बचाने के लिए खाकी ने कानून की धज्जियां उड़ाने की खुली कसम खा ली है? यह गंभीर सवाल इसलिए खड़ा हुआ है क्योंकि पसान क्षेत्र में भाजपा नेता प्रकाश चन्द्र जाखड़ द्वारा एक महिला के घर में घुसकर आबरू पर हाथ डालने और पूरे परिवार को लहूलुहान करने के मामले में 4 दिन बाद भी महिला थाने ने FIR दर्ज नहीं की है।

लिखित शिकायत के 4 दिन बीत जाने के बाद भी हाथ पर हाथ धरे बैठी कोरबा पुलिस का यह रवैया सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक ‘ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार’ फैसले की सरेआम हत्या है!

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सुप्रीम कोर्ट का वो कानून, जिसे कोरबा पुलिस ने ठेंगा दिखा दिया

सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने ललिता कुमारी जजमेंट (2013) में देश के पूरे पुलिस सिस्टम के लिए बेहद सख्त और स्पष्ट लक्ष्मण रेखा खींची थी। इस आदेश के तहत:
FIR दर्ज करना अनिवार्य (Mandatory): यदि पुलिस को मिली शिकायत से किसी भी संज्ञेय (गंभीर) अपराध का पता चलता है, तो पुलिस अधिकारी को तत्काल FIR दर्ज करनी ही होगी। पुलिस के पास एफआईआर न लिखने का कोई विकल्प नहीं है।
* जांच के बहाने देरी पूरी तरह अवैध: सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा है कि पुलिस एफआईआर दर्ज करने से पहले यह बहाना नहीं बना सकती कि “हम पहले जांच करेंगे कि आरोप सच्चे हैं या झूठे।” महिला संबंधी गंभीर अपराधों में यह बहाना पूरी तरह गैरकानूनी है।
* लापरवाह पुलिसकर्मियों पर जेल का प्रावधान: आदेश के मुताबिक, गंभीर शिकायत मिलने के बाद भी एफआईआर दर्ज न करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कड़ा अनुशासनात्मक एक्शन लिया जाना चाहिए और यह सीधे तौर पर अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का मामला बनता है, जिसके लिए दोषी पुलिस अफसर को जेल भी हो सकती है।

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4 दिन की ‘शर्मनाक’ मोहलत: क्या पीड़िता को ‘मैनेज’ करने का चल रहा है खेल?
जब सुप्रीम कोर्ट का आदेश इतना साफ है, तो फिर कोरबा की महिला थाना पुलिस 4 दिनों से किस ‘आका’ के आदेश का इंतजार कर रही है? सूत्रों और स्थानीय हलकों में यह गंभीर आशंका जताई जा रही है कि एफआईआर दर्ज न करके पुलिस आरोपी नेता को खुला समय दे रही है।
पीड़िता ने अपनी शिकायत में पहले ही साफ किया था कि आरोपी प्रकाश चन्द्र जाखड़ ने घटना के वक्त पैसे का लालच दिया था और बाद में प्रशासनिक पहुंच (एसडीएम, तहसीलदार) की धौंस दिखाते हुए पूरे परिवार को बर्बाद करने की धमकी दी थी। अब 4 दिन बीत जाने के बाद भी पुलिस का तमाशा देखना इस बात को हवा दे रहा है कि पर्दे के पीछे पीड़िता और उसके परिवार को डराने-धमकाने और मामले को दबाने का खेल खेला जा रहा है।

रसोई में घुसकर की थी बदसलूकी, बचाने आए बुजुर्ग को भी पीटा
यह पूरी खौफनाक वारदात 3 जुलाई 2026 की शाम की है, जहां जनपद उपाध्यक्ष प्रकाश चन्द्र जाखड़ शराब के नशे में धुत होकर एक 26 वर्षीय महिला के घर में जबरन घुस गया। महिला जब रसोई में खाना बना रही थी, तब आरोपी ने उससे छेड़छाड़ और जबरदस्ती की। जब महिला की चीख सुनकर उसका पति और बुजुर्ग ससुर बचाने दौड़े, तो दबंग नेता ने उनके साथ बेरहमी से मारपीट की और उन्हें जातिसूचक शब्द (‘चमार’) कहकर सरेआम अपमानित किया।
इसी साल लगा था ‘गैंगरेप और मर्डर’ का दाग, फिर भी पुलिस मेहरबान?
आरोपी प्रकाश चन्द्र जाखड़ का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड भी बेहद खौफनाक रहा है। इसी साल फरवरी 2026 में उन पर एक अन्य महिला की सामूहिक अस्मत लूटने और हत्या करने का संगीन आरोप लग चुका है, जिसकी लाश सुखरी तालाब में मिली थी। उस मामले में भी आरोपी द्वारा साक्ष्य (CCTV फुटेज) छुपाने की बात सामने आई थी। इतने गंभीर और आपराधिक इतिहास वाले नेता पर दोबारा एक महिला द्वारा घर में घुसकर आबरू से खिलवाड़ करने का आरोप लगाने के बाद भी कोरबा पुलिस का यह ‘नरम रवैया’ कई बड़े सवाल खड़े करता है।

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रसूखदार के आगे नतमस्तक खाकी से 3 सीधे सवाल:
सवाल 1: जब सुप्रीम कोर्ट का ‘ललिता कुमारी जजमेंट’ कहता है कि संज्ञेय अपराध में तुरंत FIR होनी चाहिए, तो कोरबा पुलिस किस कानून के तहत 4 दिनों से फाइल दबाकर बैठी है?
सवाल 2: क्या सत्ताधारी दल का नेता होने के कारण प्रकाश चन्द्र जाखड़ को सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और देश के संविधान से भी ऊपर मान लिया गया है?
सवाल 3: अगर खौफजदा पीड़िता और उसके परिवार के साथ कोई अनहोनी होती है, तो क्या इसकी पूरी जिम्मेदारी सीधे कोरबा एसपी और महिला थाना प्रभारी लेंगे?
पीड़िता ने पहले ही अपनी और परिवार की जान-माल की सुरक्षा की गुहार लगाई है। अब देखना यह है कि मीडिया में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना का यह मामला उछलने के बाद क्या कोरबा पुलिस की नींद टूटती है, या सत्ता के इस रसूख के आगे देश की सबसे बड़ी अदालत का कानून ऐसे ही लाचार बना रहेगा।

A Pranav

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