गढ़ कलेवा विवाद: सरकारी आदेश के बावजूद पशु चिकित्सालय परिसर खाली नहीं! गौ सेवक पहुंचे हाईकोर्ट, कटघोरा में व्यवस्था पर गंभीर सवाल

कटघोरा। कटघोरा में गढ़ कलेवा के संचालन को लेकर अब विवाद ने गंभीर रूप ले लिया है। मामला सिर्फ आपत्ति या मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि पशु चिकित्सा विभाग द्वारा करीब एक साल पहले जारी किए गए लिखित निर्देश ने पूरे प्रकरण पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। 22 मई 2025 को कार्यालय उपसंचालक पशु चिकित्सा सेवाएं, जिला कोरबा द्वारा गढ़कलेवा संचालन के लिए उपलब्ध कराए गए पुराने पशु चिकित्सालय भवन एवं परिसर को खाली करने के संबंध में बाकायदा पत्र जारी किया गया था। पत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि पशु चिकित्सालय कटघोरा परिसर में उपलब्ध कराया गया पुराना पशु चिकित्सालय भवन तत्कालीन अस्थायी व्यवस्था के तहत कलेक्टर द्वारा गढ़कलेवा संचालन के लिए दिया गया था, लेकिन गढ़कलेवा को संचालित हुए एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद समिति को अपनी व्यवस्था अलग से करने के निर्देश दिए गए।
सरकारी पत्र में साफ—31 मई 2025 तक परिसर खाली करें

सबसे गंभीर बात यह है कि विभागीय पत्र में साफ तौर पर निर्देश दिया गया था कि 31 मई 2025 तक परिसर रिक्त किया जाना सुनिश्चित किया जाए, ताकि पशुओं के उपचार एवं क्वारंटाइन व्यवस्था को सुदृढ़ किया जा सके। यानी विभाग ने स्वयं यह माना था कि पशु चिकित्सालय का परिसर पशु चिकित्सा कार्य के लिए आरक्षित है और गढ़कलेवा के संचालन के कारण असुविधा की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इसके बावजूद यदि आज भी उसी परिसर में गढ़कलेवा संचालित हो रहा है, तो बड़ा सवाल यह है कि आखिर सरकारी विभाग के लिखित निर्देश का पालन क्यों नहीं हुआ?
आदेश कागज पर, कब्जा जमीन पर?

यह मामला अब इसलिए और गंभीर हो गया है क्योंकि विभागीय पत्र महज मौखिक आपत्ति नहीं, बल्कि लिखित प्रशासनिक निर्देश है। पत्र की प्रतिलिपि कलेक्टर कोरबा, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत कोरबा, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत कटघोरा, तहसीलदार कटघोरा और प्रभारी पशु चिकित्सालय कटघोरा सहित संबंधित अधिकारियों को भी भेजी गई थी। इसके बावजूद परिसर खाली नहीं हुआ तो सवाल सीधे प्रशासनिक अमले की कार्यप्रणाली पर उठता है—क्या सरकारी आदेश का पालन कराने की जिम्मेदारी किसी की नहीं है?
पशु चिकित्सालय में गढ़ कलेवा, अब हाईकोर्ट की चौखट पर मामला

कटघोरा में गढ़कलेवा के संचालन को लेकर उठ रहे विरोध के बीच गौ सेवकों के छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुंचने से मामला अब न्यायिक स्तर पर भी गंभीर हो गया है। गौ सेवकों का कहना है कि पशु चिकित्सालय परिसर का उपयोग पशुओं के उपचार, क्वारंटाइन और संबंधित चिकित्सा सेवाओं के लिए होना चाहिए। यदि विभाग स्वयं लिखित रूप से परिसर खाली करने का निर्देश जारी कर चुका है, तो उसके बाद भी वहां व्यावसायिक गतिविधि जारी रहने की स्थिति में जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
रोजगार के नाम पर सरकारी परिसर का इस्तेमाल कब तक?
गढ़ कलेवा के माध्यम से स्थानीय रोजगार और छत्तीसगढ़ी संस्कृति को बढ़ावा देना सरकार की अच्छी पहल हो सकती है, लेकिन सवाल योजना के उद्देश्य पर नहीं बल्कि सरकारी परिसर के उपयोग और नियमों के पालन पर है। यदि किसी संस्था को अस्थायी रूप से स्थान दिया गया था और संबंधित विभाग ने बाद में उसे खाली करने का लिखित आदेश जारी कर दिया, तो उसके बाद भी उसी परिसर का उपयोग जारी रखना गंभीर प्रशासनिक सवाल पैदा करता है। रोजगार के लिए शहर में अन्य उपयुक्त स्थान उपलब्ध कराए जा सकते हैं, लेकिन पशु चिकित्सालय की जमीन आखिर पशु चिकित्सा व्यवस्था के लिए है या व्यावसायिक गतिविधि के लिए—इसका जवाब अब प्रशासन को देना होगा।
पुराना गरियाबंद हाईकोर्ट नोटिस भी बना संदर्भ
गढ़कलेवा के स्थान को लेकर गरियाबंद में सामने आए पुराने हाईकोर्ट मामले और नोटिस का संदर्भ भी अब कटघोरा के विवाद में चर्चा में है। हालांकि गरियाबंद का नोटिस पुराना है और उसे किसी नए आदेश के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता, लेकिन वहां उठे स्थान, स्वच्छता, सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़े सवाल कटघोरा के मामले में भी प्रासंगिक बहस को जन्म देते हैं। अब कटघोरा में गौ सेवकों के हाईकोर्ट पहुंचने के बाद पूरे मामले की न्यायिक दिशा पर नजर बनी हुई है।
अब प्रशासन से जवाब नहीं, कार्रवाई की मांग
कटघोरा के लोगों और गौ सेवकों का सवाल बेहद सीधा है—जब पशु चिकित्सा विभाग ने 22 मई 2025 को लिखित आदेश जारी कर 31 मई 2025 तक परिसर खाली करने कहा था, तो आखिर परिसर खाली क्यों नहीं हुआ? क्या उस आदेश के बाद कोई नया आदेश जारी हुआ? क्या गढ़कलेवा को वहां संचालन जारी रखने की अनुमति दी गई? अगर हां, तो किस सक्षम अधिकारी ने और किस आधार पर? और अगर कोई नई अनुमति नहीं है तो फिर सरकारी आदेश की अवहेलना करते हुए संचालन कैसे जारी है?
अब मामला गढ़कलेवा हटाने की मांग से आगे बढ़ चुका है। सवाल सरकारी आदेश की प्रतिष्ठा, पशु चिकित्सालय की जमीन के उपयोग और प्रशासनिक जवाबदेही का है। विभाग का लिखित आदेश सामने होने के बावजूद यदि परिसर खाली नहीं कराया गया, तो यह जांच का विषय है कि आखिर आदेश के बाद कौन-सी ऐसी ताकत थी जिसके सामने सरकारी निर्देश ही बेअसर हो गया? गौ सेवकों के हाईकोर्ट पहुंचने के बाद अब इस पूरे मामले में प्रशासन और संबंधित विभाग की भूमिका पर सबकी नजर है।









