कटघोरा वनमंडल में करंट से मादा भालू व दो शावकों की मौत, रेंजर–एसडीओ की भूमिका पर उठे सवाल
रेंजर अभिषेक दुबे और एसडीओ संजय त्रिपाठी की भूमिका पर सवाल

कोरबा। कटघोरा वनमंडल अंतर्गत एक गंभीर और चिंताजनक मामला सामने आया है, जहां केंदई वनपरिक्षेत्र के कोरबी वनवृत्त के सखोदा परिसर में एक मादा भालू और उसके दो शावकों के शव मिले हैं। प्रारंभिक जांच में तीनों की मौत 11 केवी विद्युत लाइन की चपेट में आने से होना सामने आया है।
जानकारी के अनुसार, यह विद्युत लाइन बिना पूर्व अनुमति के जंगल क्षेत्र में बिछाई गई थी, जो कि वन संरक्षण अधिनियम 1980 का स्पष्ट उल्लंघन है। वन क्षेत्र में किसी भी प्रकार के निर्माण या विद्युत लाइन बिछाने के लिए पूर्व स्वीकृति अनिवार्य होती है।

रेंजर अभिषेक दुबे और एसडीओ संजय त्रिपाठी की भूमिका पर सवाल
मामले में केंदई वनपरिक्षेत्र के रेंजर अभिषेक दुबे और संबंधित एसडीओ संजय त्रिपाठी की भूमिका भी जांच के घेरे में आ गई है।

स्थानीय सूत्रों का कहना है कि वन क्षेत्र में इस तरह की गतिविधियों की जानकारी क्षेत्रीय अधिकारियों को होना स्वाभाविक है। इसके बावजूद यदि बिना अनुमति के विद्युत लाइन बिछाई गई, तो यह निगरानी में गंभीर लापरवाही मानी जा रही है। यह भी सवाल उठ रहे हैं कि क्या इस पूरे मामले में अधिकारियों की अनदेखी या मिलीभगत रही, जिसके कारण यह खतरनाक स्थिति बनी और अंततः वन्यजीवों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
जलस्रोत निर्माण में भी गड़बड़ी, संरक्षण योजनाओं पर सवाल

कटघोरा वनमंडल में वन्यजीवों के लिए बनाए जा रहे जलस्रोत भी विवादों में हैं। केंदई वनपरिक्षेत्र के पतुरियाडाँड़ जंगल में लाखों रुपये की लागत से बनाए गए तालाब की स्थिति बेहद खराब बताई जा रही है। यह तथाकथित जलस्रोत पानी तक नहीं रोक पा रहा, जिससे हाथियों सहित अन्य वन्यजीवों को कोई लाभ नहीं मिल रहा। इससे संरक्षण योजनाओं के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
लापरवाही और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े वन्यजीव?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता का उदाहरण है। एक ओर अवैध विद्युत लाइन और दूसरी ओर अधूरे संरक्षण कार्य—दोनों मिलकर वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
कार्रवाई की मांग तेज
वन विभाग ने संबंधित पारेषण कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की है, वहीं अब स्थानीय स्तर पर जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग भी तेज हो गई है। यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो इस तरह की घटनाएं आगे भी सामने आ सकती हैं।









