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“भ्रष्टाचार के 13 प्रकरण, निरस्त जाति प्रमाण-पत्र और रुकी कार्रवाई: एक सिग्नेचर के इंतजार में अटका पूरा कटारे मामला”

“धारा 17(क) के जाल में फंसी 13 शिकायतें”

13 फाइलें, एक अफसर के.के. कटारे पर आरोपों का जाल, कार्रवाई एक अनुमति पर अटकी –

EOW/ACB में 13 प्रकरण, धारा 17(क) बनी बाधा अब जाति प्रमाण-पत्र विवाद ने बढ़ाई गंभीरता –

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रायपुर-विशेष रिपोर्ट : – कभी फाइलों में दबे रहने वाले आरोप जब विधानसभा के पटल पर आते हैं, तो सिर्फ कागज ही नहीं हिलते बल्कि पूरा सिस्टम सवालों के घेरे में आ जाता है। ध्यानाकर्षण क्रमांक 413 ने ऐसा ही एक मामला सामने ला दिया है जहाँ एक नाम, के.के. कटारे, और उसके इर्द-गिर्द घूमती 13 अलग-अलग शिकायतों की पूरी फाइल अब जांच एजेंसियों के सामने है।

यह कहानी किसी एक घटना की नहीं है।

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2016 से 2019 तक अलग-अलग समय पर दर्ज शिकायतें अलग-अलग आरोप लेकिन हर बार केंद्र में एक ही सवाल पद, पैसा प्रक्रिया और पॉवर।

फाइलों में क्या दर्ज है –

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ACB/EOW के रिकॉर्ड में दर्ज मामलों को देखें तो तस्वीर धीरे-धीरे साफ होती जाती है। कहीं ठेकेदारों को अतिरिक्त भुगतान दिखाकर शासन को आर्थिक नुकसान पहुँचाने के आरोप हैं तो कहीं बिना काम के सड़क निर्माण का मामला। निविदा प्रक्रियाओं में गड़बड़ी, आय से अधिक संपत्ति, प्रमोशन में अनियमितता, यहाँ तक कि खुद ठेकेदारी और बोगस भुगतान जैसे गंभीर आरोप भी दर्ज हैं। कुल मिलाकर 13 अलग-अलग प्रकरण, जिनमें से कई को एक ही प्रारंभिक जांच (12/2018) में समाहित कर दिया गया है। यानि आरोप बिखरे नहीं एक ही धागे में पिरो दिए गए हैं।

लेकिन कार्रवाई क्यों नहीं?

यहीं से कहानी का सबसे अहम मोड़ शुरू होता है। जांच एजेंसियों ने दस्तावेज जुटाए प्रकरण दर्ज किए लेकिन फाइल एक जगह आकर ठहर गई धारा 17(क), भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम इस प्रावधान के तहत किसी भी सरकारी अधिकारी के खिलाफ आगे की कार्रवाई से पहले शासन की अनुमति जरूरी होती है। ACB/EOW ने 25 अक्टूबर 2024 को अनुमति के लिए पत्र भेजा लेकिन उसके बाद से मामला “प्रतीक्षा” में है।

धारा 17(क) सुरक्षा या बाधा?

कागजों में यह प्रावधान अधिकारियों को अनावश्यक कार्रवाई से बचाने के लिए बनाया गया है। लेकिन जमीनी स्तर पर सवाल खड़ा होता है क्या यह सुरक्षा कवच है या कार्रवाई की सबसे बड़ी बाधा? जब छोटी रकम के ट्रैप केस तेजी से सामने आते हैं, तो यह सवाल और तेज हो जाता है क्या जांच एजेंसियां सिर्फ छोटे मामलों तक सीमित रह जाती हैं? या फिर सिस्टम में फैले बड़े आरोपों तक भी पहुँच पाती हैं?

अब जुड़ा नया मोड़ जाति प्रमाण-पत्र –

इस पूरे प्रकरण के बीच एक और गंभीर पहलू सामने आया है। के.के. कटारे के जाति प्रमाण-पत्र को छानबीन समिति द्वारा निरस्त किया जाना मामले को एक नई दिशा देता है।

राज्यवार आरक्षण नियम, 1950 की अधिसूचना और 1978 पूर्व निवास के आधार पर की गई जांच के बाद समिति ने स्पष्ट कहा नियमानुसार आगे की कार्यवाही सुनिश्चित करें

अब यह मामला सिर्फ भ्रष्टाचार के आरोपों तक सीमित नहीं रहा एक तरफ ACB/EOW के 13 प्रकरण , दूसरी तरफ जाति प्रमाण-पत्र की वैधता पर सवाल ? यानी जांच के दो अलग रास्ते लेकिन मंजिल एक ही कानूनी परीक्षण

सबसे बड़ा सवाल –

क्या 13 मामलों में कार्रवाई आगे बढ़ेगी? क्या शासन धारा 17(क) की अनुमति देगा? क्या जाति प्रमाण-पत्र का मामला नई दिशा तय करेगा? या फिर यह पूरा मामला फाइलों में ही सिमट कर रह जाएगा? सवाल सिर्फ एक अफसर का नहीं है , पूरा सिस्टम सवालों में है।

यह कहानी सिर्फ एक अधिकारी की नहीं है।

यह उस व्यवस्था की भी कहानी है जहाँ शिकायत दर्ज होती है जांच शुरू होती है दस्तावेज सामने आते हैं लेकिन फैसला किसी एक अनुमति पर अटक जाता है।

13 फाइलें खुल चुकी हैं आरोप दर्ज हैं जांच भी हो चुकी है अब पूरा मामला एक सिग्नेचर पर टिका है जो तय करेगा कि यह कहानी फाइलों में दब जाएगी या कार्रवाई की शुरुआत बनेगी।यह मामला अब सिर्फ आरोपों का नहीं, बल्कि सिस्टम की गति और नीयत दोनों की परीक्षा है।

 

A Pranav

professional journalist

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