KATGHORA : “उंगली टेढ़ी किए बिना घी नहीं निकलता…” अभिभावक ने लड़ी लड़ाई तो त्रिलोकी पब्लिक स्कूल को लौटाने पड़े ₹29,330
अभिभावक के आगे झुके आशु धनोंदिया, ₹29,330 का चेक सौंपकर मांगी माफी!

एक अभिभावक के संघर्ष ने खोली निजी स्कूलों की फीस व्यवस्था की परतें
कटघोरा। “उंगली टेढ़ी किए बिना घी नहीं निकलता, अपने हक की एक चवन्नी भी जरूरी है।” यह सिर्फ एक कहावत नहीं, बल्कि कटघोरा के एक अभिभावक के संघर्ष की कहानी बन गई। निजी स्कूल की फीस वसूली पर सवाल उठाने वाले अभिभावक ने हार नहीं मानी और आखिरकार त्रिलोकी पब्लिक स्कूल को ₹29,330 की राशि वापस करनी पड़ी।यह मामला अब पूरे जिले के अभिभावकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। सवाल उठ रहे हैं कि यदि अभिभावक आवाज नहीं उठाते, तो क्या यह राशि कभी वापस होती?

जब अभिभावक ने कहा – अब अन्याय नहीं सहेंगे
छात्र हर्षित अग्रवाल के माता-पिता प्रवीण अग्रवाल एवं पूजा अग्रवाल ने स्कूल द्वारा ली गई फीस पर आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने संबंधित अधिकारियों के समक्ष शिकायत की और नियमों के आधार पर अपना पक्ष रखा। शिकायत के बाद पूरे मामले की समीक्षा हुई और अंततः स्कूल प्रबंधन को अतिरिक्त ली गई राशि वापस करनी पड़ी।

स्कूल ने खुद लौटाए ₹29,330
स्कूल के आधिकारिक पत्र के अनुसार अभिभावक से कुल ₹41,900 की फीस ली गई थी। बाद में तीन माह के अध्ययन एवं परिवहन शुल्क के नाम पर ₹12,570 रखकर शेष ₹29,330 की राशि चेक के माध्यम से वापस कर दी गई। यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है—यदि फीस पूरी तरह सही थी, तो फिर इतनी बड़ी राशि लौटाने की जरूरत क्यों पड़ी?


“अपने हक की एक चवन्नी भी जरूरी है”
राशि वापस मिलने के बाद अभिभावक ने अन्य अभिभावकों से अपील करते हुए कहा—
“उंगली टेढ़ी किए बिना घी नहीं निकलता। अपने हक की एक चवन्नी भी जरूरी है। यदि गलत वसूली हो रही है तो चुप मत बैठिए। नियमों के तहत शिकायत कीजिए और अपने अधिकार के लिए लड़िए।”
यह संदेश अब उन हजारों अभिभावकों के लिए भी प्रेरणा बन रहा है जो निजी स्कूलों की फीस को लेकर मन में सवाल तो रखते हैं, लेकिन आवाज उठाने से बचते हैं।
क्या अब खुलेंगे और भी मामले?
इस घटनाक्रम के बाद यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या अन्य अभिभावकों से भी इसी प्रकार फीस ली गई है। यदि ऐसे और मामले सामने आते हैं, तो शिक्षा विभाग पर व्यापक जांच का दबाव बढ़ सकता है।

अब शिक्षा विभाग की परीक्षा
यह मामला केवल ₹29,330 की वापसी तक सीमित नहीं है, बल्कि निजी स्कूलों की फीस व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही का सवाल भी खड़ा करता है। अब निगाहें शिक्षा विभाग पर हैं कि क्या वह इस मामले को एक उदाहरण मानकर जिले के अन्य निजी स्कूलों की फीस वसूली की भी जांच करेगा, या फिर मामला यहीं थम जाएगा। एक बात तय है—इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि यदि अभिभावक जागरूक हों, नियमों की जानकारी रखें और अपने अधिकारों के लिए डट जाएं, तो व्यवस्था को जवाब देना ही पड़ता है।









