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रिश्वत VIDEO पर सिर्फ दिखावटी कार्रवाई?” मनरेगा तकनीकी सहायक को बचाने के आरोप, बर्खास्तगी की जगह सिर्फ ‘पृथक’… खबर का असर या महज लीपापोती?

शिकायतकर्ता बोला — “VIDEO के बाद भी कार्रवाई आधी-अधूरी”

रिश्वत VIDEO पर सिर्फ दिखावटी कार्रवाई? मनरेगा तकनीकी सहायक को बचाने का आरोप, बर्खास्तगी की जगह सिर्फ “पृथक”

खबर का असर या सिर्फ लीपापोती? रिश्वत VIDEO के बाद भी तकनीकी सहायक सिर्फ “पृथक”, बर्खास्त नहीं…

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गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। मनरेगा में कथित रिश्वतखोरी का VIDEO वायरल होने और मीडिया में मामला उछलने के बाद जिला पंचायत ने तकनीकी सहायक तरुण ताम्रकार को “कार्य से पृथक” तो कर दिया, लेकिन अब इस कार्रवाई को लेकर सवाल खड़े होने लगे हैं। शिकायतकर्ता और ग्रामीणों का आरोप है कि प्रशासन ने सिर्फ खानापूर्ति करते हुए लीपापोती वाली कार्रवाई की है, जबकि खुलेआम रिश्वत लेते VIDEO सामने आने के बाद तत्काल बर्खास्तगी होनी चाहिए थी।

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मामला पशु शेड मूल्यांकन के नाम पर कथित रिश्वत वसूली से जुड़ा है। आरोप है कि तकनीकी सहायक ने हितग्राही से ₹5000 की मांग की थी और ₹4000 लेते हुए VIDEO भी रिकॉर्ड हुआ। VIDEO वायरल होने के बाद पूरे जिले में हड़कंप मच गया था।

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इसके बावजूद जिला पंचायत ने केवल “पदीय दायित्वों से पृथक” करने का आदेश जारी किया। यानी संबंधित कर्मचारी की नौकरी अभी खत्म नहीं हुई है, सिर्फ उसे वर्तमान काम से हटाया गया है। यही बात अब लोगों के गले नहीं उतर रही।

शिकायतकर्ता बोला — “VIDEO के बाद भी कार्रवाई आधी-अधूरी”

शिकायतकर्ता हेतराम राठौर का कहना है कि:

“मैंने खुद अपने हाथ से पैसे दिए हैं, VIDEO सबूत भी मौजूद है। फिर भी सिर्फ पृथक करना समझ से परे है। अगर यही भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई है तो यह सिर्फ दिखावा है।” उन्होंने चेतावनी दी है कि मामले की शिकायत अब ACB से की जाएगी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत FIR दर्ज कराने की मांग की जाएगी।

“पहले VIDEO की जांच” कहकर समय क्यों? जिला पंचायत CEO का कहना है कि VIDEO की सत्यता की जांच साइबर शाखा से कराई जाएगी, जिसके बाद आगे बर्खास्तगी और FIR की कार्रवाई हो सकती है। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि जब रिश्वत लेते कर्मचारी का VIDEO सार्वजनिक है, तब तत्काल कठोर कार्रवाई से प्रशासन क्यों बचता नजर आ रहा है?

 

भ्रष्टाचार पर नरमी या सिस्टम की मजबूरी?

क्षेत्र में चर्चा है कि यदि किसी आम कर्मचारी या ग्रामीण पर इतनी गंभीर शिकायत होती तो अब तक पुलिस कार्रवाई हो चुकी होती। लेकिन सरकारी तंत्र में अक्सर “जांच जारी है” कहकर मामलों को लंबा खींच दिया जाता है। यही वजह है कि लोग इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती नहीं बल्कि “प्रशासनिक लीपापोती” मान रहे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या जिला प्रशासन सच में भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस दिखाएगा या मामला सिर्फ “पृथक” करने तक ही सीमित रह जाएगा।

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