कलेक्टर जनदर्शन फिर बना मजाक! मृत आदिवासी महिला को जिंदा दिखाकर 8.65 एकड़ जमीन की कथित रजिस्ट्री की शिकायत, पहले जवाब में अपलोड कर दिया कंप्यूटर जमा करने का पत्र! अब जुलाई में तहसीलदार बने अविनाश कुजूर ने मई में ही जारी कर दिया जांच प्रतिवेदन!

GPM में जनदर्शन की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल! पहले असंबंधित कार्यालयीन पत्र अपलोड कर शिकायत को दिखाया पूर्ण, फिर शिकायतकर्ता के विरुद्ध कार्रवाई की अनुशंसा! 7 मई के प्रतिवेदन पर अविनाश कुजूर के हस्ताक्षर, जबकि मरवाही तहसीलदार पद पर पदस्थापना का आदेश 3 जुलाई का! पोर्टल पर कार्रवाई अधिकारी भरत कौशिक का नाम और दो अलग-अलग तारीखें दर्ज, आखिर शिकायत का वास्तविक निराकरण किसने किया?
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। आम जनता की शिकायतों का त्वरित और पारदर्शी निराकरण करने के सरकारी दावों की हकीकत गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में सामने आए एक मामले ने सवालों के घेरे में खड़ी कर दी है। मुख्यमंत्री जनदर्शन पोर्टल पर दर्ज लगभग 8.65 एकड़ आदिवासी भूमि की कथित फर्जी रजिस्ट्री की शिकायत के निराकरण में ऐसे दस्तावेज सामने आए हैं, जिनके बीच का विरोधाभास प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। शिकायत में आरोप है कि 16 साल पहले मृत हो चुकी आदिवासी महिला को जीवित दर्शाकर वर्ष 2026 में उनकी जमीन की रजिस्ट्री करा दी गई। राजस्व अभिलेखों में जाति और नाम संबंधी बदलाव का आरोप भी लगाया गया। लेकिन इतनी गंभीर शिकायत के जवाब में पहले कार्यालयीन कंप्यूटर जमा करने से संबंधित पत्र अपलोड कर शिकायत को पूर्ण दिखाए जाने का आरोप है। इसके बाद 7 मई 2026 का एक जांच प्रतिवेदन सामने आया, जिसमें शिकायत को भ्रामक बताते हुए शिकायतकर्ता के विरुद्ध कार्रवाई और शिकायत हटाने की अनुशंसा किए जाने का उल्लेख है।

मामले को और गंभीर बनाता है जनदर्शन पोर्टल का नया रिकॉर्ड। यहां कार्रवाई अधिकारी के रूप में भरत कौशिक का नाम दर्ज है, जबकि 7 मई के जांच प्रतिवेदन पर अविनाश कुजूर के हस्ताक्षर और तहसीलदार मरवाही का पदनाम अंकित है। दूसरी ओर अविनाश कुजूर की मरवाही तहसीलदार के पद पर पदस्थापना का आदेश 3 जुलाई 2026 का है। पोर्टल पर कार्रवाई की तारीखें 7 मई और 21 अक्टूबर 2026 दर्ज हैं।
अब सवाल केवल जमीन की कथित फर्जी रजिस्ट्री का नहीं, बल्कि यह भी है कि जनदर्शन में शिकायत का निराकरण किसने किया, किस दस्तावेज के आधार पर किया और अधिकारियों के नाम तथा कार्रवाई की तारीखों में यह अंतर क्यों दिखाई दे रहा है?

16 साल पहले मृत्यु, फिर 2026 में कथित रजिस्ट्री! 8.65 एकड़ आदिवासी जमीन का मामला
शिकायतकर्ता सोमवती पति लवन सिंह, निवासी ग्राम पोड़ी, तहसील मरवाही ने मुख्यमंत्री जनदर्शन में शिकायत क्रमांक 2280126000719 दर्ज कराई। शिकायत का विषय ही अपने आप में बेहद गंभीर है। इसमें जाति और नाम बदलकर तथा मृत व्यक्ति को जीवित दर्शाकर कथित फर्जी रजिस्ट्री किए जाने का आरोप लगाया गया है।

शिकायत के अनुसार सोमवती की नानी स्वर्गीय जोहरी बाई गोंड की मृत्यु 16 जून 2010 को हो चुकी थी। इसके बावजूद आरोप है कि 16 अप्रैल 2026 को उन्हें जीवित दर्शाते हुए लगभग 3.5010 हेक्टेयर यानी 8.65 एकड़ भूमि की रजिस्ट्री कराई गई। शिकायत में अविनाश एनर्जी प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में जमीन हस्तांतरण किए जाने का भी आरोप लगाया गया है।
इतना ही नहीं, शिकायतकर्ता ने मूल राजस्व अभिलेखों में दर्ज आदिवासी गोंड जाति की प्रविष्टि को बदलकर कन्वर्ट अथवा अन्य श्रेणी में दर्ज किए जाने का आरोप भी लगाया है।
यदि संबंधित महिला की मृत्यु वर्ष 2010 में हो चुकी थी तो वर्ष 2026 में उनके नाम से कथित रजिस्ट्री कैसे हुई? रजिस्ट्री के दौरान पहचान का सत्यापन किस आधार पर किया गया? राजस्व रिकॉर्ड में जाति संबंधी प्रविष्टि किस आदेश से बदली गई? इन सवालों का जवाब मूल दस्तावेजों की निष्पक्ष जांच से ही मिल सकता है।
जमीन की शिकायत का जवाब कंप्यूटर जमा करने का पत्र! जनदर्शन में कैसी खानापूर्ति?
इस मामले में सामने आया पहला दस्तावेज 16 अप्रैल 2026 का है, जो कार्यालय तहसीलदार मरवाही से कलेक्टर को भेजा गया है। पत्र का विषय निर्वाचक नामावली के Form 6, 7 एवं 8 के समय पर निराकरण नहीं होने के संबंध में नोटिस का जवाब है।
इस पत्र में कार्यालयीन कंप्यूटर का एक सेट निजी कार्य के लिए ले जाने, इससे कार्यालयीन कार्य प्रभावित होने और कंप्यूटर जमा नहीं करने पर अंतिम वेतन प्रमाण-पत्र एवं व्यक्तिगत नस्ती नहीं भेजने की चेतावनी का उल्लेख है। पत्र के निचले हिस्से में 23 जुलाई 2025 की तारीख का भी उल्लेख दिखाई देता है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसी असंबंधित कार्यालयीन पत्र को जमीन की कथित फर्जी रजिस्ट्री की शिकायत के निराकरण में जनदर्शन पोर्टल पर अपलोड कर दिया गया और शिकायत को पूर्ण दिखा दिया गया।
अब सवाल यह है कि मृत आदिवासी महिला की पहचान, कथित फर्जी रजिस्ट्री और राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव की शिकायत का कार्यालयीन कंप्यूटर जमा करने वाले पत्र से आखिर क्या संबंध है?
क्या यह गलत फाइल अपलोड होने का मामला था? यदि तकनीकी या कार्यालयीन गलती थी तो उसे सुधारने की जिम्मेदारी किसकी थी? क्या इस पत्र को ही शिकायत के निराकरण का आधार बनाया गया? प्रशासन को इसका स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
जनता ने जमीन की कथित फर्जी रजिस्ट्री की जांच मांगी थी, कंप्यूटर जमा करने का हिसाब नहीं!
जुलाई में बने मरवाही तहसीलदार, मई में ही जारी कर दिया जांच प्रतिवेदन! अतिरिक्त प्रभार का आदेश कहां?
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल तहसीलदार अविनाश कुजूर की पदस्थापना को लेकर है।
कलेक्टर कार्यालय के आदेश क्रमांक 1452/कले./स्थापना/2026 दिनांक 03/07/2026 के अनुसार अविनाश कुजूर को तहसीलदार पेंड्रा से तहसीलदार मरवाही के पद पर पदस्थ किया गया था।
लेकिन इससे लगभग दो महीने पहले 07/05/2026 को कार्यालय तहसीलदार मरवाही से कलेक्टर जनदर्शन शाखा को भेजे गए जांच प्रतिवेदन पर अविनाश कुजूर के हस्ताक्षर दर्ज हैं। उनके हस्ताक्षर के नीचे स्पष्ट रूप से ‘तहसीलदार, मरवाही’ का पदनाम अंकित है।
इस प्रतिवेदन में शिकायत को भ्रामक बताते हुए शिकायतकर्ता के विरुद्ध कार्रवाई और जनदर्शन पोर्टल से शिकायत हटाने की अनुशंसा किए जाने का मामला सामने आया है।
अब सवाल है कि जब मरवाही तहसीलदार के पद पर उनकी नियमित पदस्थापना का आदेश 3 जुलाई को जारी हुआ, तो 7 मई को वे तहसीलदार मरवाही के पदनाम से सरकारी जांच प्रतिवेदन किस प्रशासनिक अधिकार के तहत जारी कर रहे थे?
क्या उन्हें पहले ही अतिरिक्त अथवा अस्थायी प्रभार सौंपा गया था? यदि हां, तो संबंधित आदेश कहां है? कार्यभार ग्रहण करने की तारीख क्या थी? प्रशासन को अतिरिक्त प्रभार का आदेश और कार्यभार ग्रहण करने का रिकॉर्ड सार्वजनिक करना चाहिए। यदि ऐसा कोई आदेश नहीं था तो मई में जारी प्रतिवेदन की प्रशासनिक वैधता और उसे जारी करने की प्रक्रिया की जांच जरूरी है।
पोर्टल पर अधिकारी भरत कौशिक, प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर अविनाश कुजूर के! आखिर असली निराकरणकर्ता कौन?
मामले में सामने आए मुख्यमंत्री जनदर्शन पोर्टल के स्क्रीनशॉट ने एक और विरोधाभास उजागर किया है। पोर्टल पर शिकायत की स्थिति ‘पूर्ण’ दर्ज है। कार्रवाई विवरण में अधिकारी का नाम भरत कौशिक और पदनाम तहसीलदार दर्ज दिखाई देता है। अधिकारी विवरण में भरत कौशिक का नाम दो बार प्रदर्शित हो रहा है।
इसी रिकॉर्ड में कार्रवाई की तारीख 07/05/2026 और 21/10/2026 दिखाई दे रही है। दोनों तारीखों के सामने View File का विकल्प भी मौजूद है।
अब सवाल यह है कि जब 7 मई के जांच प्रतिवेदन पर अविनाश कुजूर के हस्ताक्षर हैं, तो पोर्टल पर कार्रवाई अधिकारी के रूप में भरत कौशिक का नाम किस आधार पर दर्ज है? क्या भरत कौशिक ने प्रतिवेदन तैयार किया, अनुमोदित किया या केवल पोर्टल पर कार्रवाई दर्ज की? 21 अक्टूबर को दोबारा कौन-सी कार्रवाई की गई? क्या उस दिन कोई नया जांच प्रतिवेदन अपलोड किया गया?
एक ही शिकायत में अधिकारी का नाम, हस्ताक्षर और कार्रवाई की तारीखों का यह पूरा रिकॉर्ड प्रशासन से स्पष्टीकरण मांग रहा है। पोर्टल की मूल Action History, फाइल अपलोड करने वाले अधिकारी का विवरण और दोनों तारीखों की कार्रवाई का रिकॉर्ड सार्वजनिक होना चाहिए।
शिकायत को भ्रामक बताने की जल्दबाजी, मूल आरोपों की जांच का जवाब कौन देगा?
जनदर्शन आम नागरिकों को अपनी शिकायत शासन और प्रशासन तक पहुंचाने का आधिकारिक माध्यम है। लेकिन इस मामले में शिकायत को भ्रामक बताते हुए शिकायतकर्ता के विरुद्ध कार्रवाई की अनुशंसा किए जाने से शिकायत निवारण प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
क्या शिकायतकर्ता को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया? क्या संबंधित पक्षों के बयान दर्ज किए गए? क्या रजिस्ट्री कार्यालय से मूल दस्तावेज मंगाए गए? क्या मृत्यु प्रमाण पत्र का सत्यापन किया गया? क्या राजस्व रिकॉर्ड में जाति और नाम संबंधी बदलाव की जांच हुई? क्या आदिवासी भूमि के हस्तांतरण की वैधानिकता की पड़ताल की गई?
यदि शिकायत के आरोप गलत थे तो उन्हें गलत साबित करने वाले दस्तावेज सार्वजनिक किए जाने चाहिए। गंभीर आरोपों की जांच किए बिना केवल शिकायत को भ्रामक बता देना किसी भी स्थिति में वास्तविक और पारदर्शी निराकरण का विकल्प नहीं हो सकता।
कलेक्टर की तीन सदस्यीय जांच समिति कहां? 10 दिन की समयसीमा के बाद भी जवाब का इंतजार
मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर द्वारा तीन सदस्यीय जांच समिति गठित कर 10 दिनों के भीतर जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करने के निर्देश दिए जाने की जानकारी सामने आई थी। लेकिन शिकायतकर्ता के अनुसार निर्धारित समयसीमा बीतने के बाद भी जांच के निष्कर्ष और कार्रवाई की स्थिति सार्वजनिक नहीं हुई है।
अब जांच का दायरा केवल 8.65 एकड़ आदिवासी भूमि की कथित फर्जी रजिस्ट्री तक सीमित नहीं रहना चाहिए। समिति को जनदर्शन पोर्टल पर अपलोड किए गए सभी दस्तावेजों, कार्रवाई की तारीखों, अधिकारियों के विवरण, 7 मई के जांच प्रतिवेदन और 3 जुलाई के पदस्थापना आदेश की भी जांच करनी चाहिए।
यह स्पष्ट होना चाहिए कि 16 अप्रैल का असंबंधित पत्र किसने अपलोड किया? 7 मई का प्रतिवेदन किसके आदेश से तैयार हुआ? अविनाश कुजूर को मरवाही तहसीलदार का अतिरिक्त प्रभार कब मिला? पोर्टल पर भरत कौशिक का नाम कार्रवाई अधिकारी के रूप में क्यों दर्ज है? 21 अक्टूबर को क्या कार्रवाई हुई? और सबसे अहम, जमीन की मूल शिकायत की स्वतंत्र जांच कहां तक पहुंची?
अब प्रशासन से सीधे सवाल!
मृत आदिवासी महिला की कथित रजिस्ट्री की शिकायत में कंप्यूटर जमा करने का पत्र क्यों अपलोड किया गया?
शिकायत को पूर्ण करने का निर्णय किस अधिकारी ने लिया और किस आधार पर लिया?
7 मई के प्रतिवेदन पर अविनाश कुजूर के हस्ताक्षर किस प्रशासनिक अधिकार से हुए?
पोर्टल पर कार्रवाई अधिकारी के रूप में भरत कौशिक का नाम क्यों दर्ज है?
07 मई और 21 अक्टूबर 2026 की कार्रवाई में क्या अंतर है?
शिकायतकर्ता के विरुद्ध कार्रवाई की अनुशंसा किन दस्तावेजों और प्रमाणों के आधार पर की गई?
कलेक्टर द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने अब तक क्या निष्कर्ष निकाला?
जनदर्शन जनता की शिकायत सुनने का मंच है या शिकायतों को पोर्टल पर बंद करने की मशीन?
करहनी की 8.65 एकड़ आदिवासी भूमि का मामला अब केवल कथित फर्जी रजिस्ट्री तक सीमित नहीं रह गया है। यह मुख्यमंत्री जनदर्शन की पारदर्शिता, राजस्व विभाग की जवाबदेही और सरकारी दस्तावेजों की विश्वसनीयता की भी परीक्षा बन चुका है।
जिला प्रशासन को अब केवल पोर्टल पर ‘पूर्ण’ लिखे स्टेटस का हवाला देने के बजाय पूरी कार्रवाई का रिकॉर्ड सार्वजनिक करना चाहिए। असंबंधित पत्र अपलोड करने की जिम्मेदारी तय हो, 7 मई के प्रतिवेदन की वैधता स्पष्ट हो, दोनों अधिकारियों की भूमिका सामने आए और मूल जमीन विवाद की स्वतंत्र जांच कराई जाए।
क्योंकि जनदर्शन में जनता ने न्याय मांगा था, फाइलों का खेल नहीं। शिकायत का जवाब देने के बजाय शिकायतकर्ता को ही कटघरे में खड़ा करने के आरोपों पर अब कलेक्टर को दस्तावेजों के साथ जवाब देना चाहिए।







