पेंड्रा-राजस्व अधिकारी और भू-माफियाओं का एक और कथित फर्जीवाड़ा! पतगवां में आदिवासी जमीन का गैर-आदिवासियों के नाम नामांतरण, फिर कई रजिस्ट्रियों का खेल!
आदिवासी महिला के नाम दर्ज जमीन को गैर-आदिवासी परिजनों के नाम चढ़ाने का आरोप, नामांतरण की प्रक्रिया और उसके बाद हुई जमीन की खरीद-बिक्री पर गंभीर सवाल।

पेंड्रा। गौरेला-पेंड्रा-मरवाही जिले में जमीन से जुड़े विवादों के बीच पेंड्रा तहसील क्षेत्र के ग्राम पतगवां से आदिवासी भूमि के कथित अवैध नामांतरण और उसके बाद खरीद-बिक्री का गंभीर मामला सामने आया है। आरोप है कि राजस्व अधिकारियों और भू-माफियाओं की कथित मिलीभगत से आदिवासी महिला के नाम दर्ज भूमि को गैर-आदिवासी परिजनों के नाम पर नामांतरित कराया गया। इसके बाद उक्त भूमि की कई रजिस्ट्रियां भी कराई गईं।
मामला केवल राजस्व रिकॉर्ड में नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे आदिवासी भूमि के स्वामित्व में बदलाव कर जमीन के कारोबार का रास्ता तैयार किए जाने की आशंका भी जताई जा रही है।

आदिवासी महिला की जमीन गैर-आदिवासी परिजनों के नाम कैसे हुई?
मामले के अनुसार, ग्राम पतगवां में संबंधित भूमि मूल रूप से एक आदिवासी महिला के नाम पर दर्ज थी। बताया जा रहा है कि उक्त महिला का विवाह सामान्य जाति के परिवार में हुआ था। आरोप है कि महिला के वैवाहिक संबंधों से जुड़े गैर-आदिवासी परिजनों के नाम पर संबंधित भूमि का नामांतरण कर दिया गया।

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किस कानूनी आधार पर आदिवासी महिला के नाम दर्ज भूमि गैर-आदिवासी परिजनों के नाम पर दर्ज की गई? क्या केवल पारिवारिक संबंध या विवाह के आधार पर भूमि के स्वामित्व में बदलाव किया जा सकता है? नामांतरण के दौरान मूल खातेदार की स्थिति और आदिवासी भूमि के हस्तांतरण से जुड़े प्रतिबंधों की जांच की गई थी या नहीं?
राजस्व अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल

इस पूरे मामले में नामांतरण की प्रक्रिया और संबंधित राजस्व अधिकारियों की भूमिका जांच के दायरे में आनी चाहिए। आखिर किस आवेदन, किस राजस्व प्रतिवेदन और किन दस्तावेजों के आधार पर भूमि का नामांतरण किया गया? क्या सक्षम प्राधिकारी की अनुमति ली गई थी? क्या भूमि की मूल प्रकृति और उसके स्वामित्व संबंधी अभिलेखों का विधिवत परीक्षण किया गया था?
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 165(6) के तहत आदिवासी खातेदारों की भूमि के हस्तांतरण पर विशेष प्रतिबंध और शर्तें लागू होती हैं। ऐसे में इस प्रकरण में संबंधित आदेशों और लागू कानूनी प्रावधानों की निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है।
नामांतरण के बाद कई रजिस्ट्रियां, किसने तैयार किया जमीन कारोबार का रास्ता?
मामले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू नामांतरण के बाद सामने आता है। आरोप है कि राजस्व रिकॉर्ड में गैर-आदिवासी परिजनों के नाम दर्ज होने के बाद भू-माफियाओं ने उक्त भूमि की कई रजिस्ट्रियां कराईं। सवाल यह है कि यदि भूमि मूल रूप से आदिवासी महिला के नाम पर दर्ज थी, तो उसके बाद हुए हस्तांतरणों की वैधानिकता की जांच किस स्तर पर की गई?
क्या पंजीयन विभाग ने भूमि के मूल रिकॉर्ड और आदिवासी भूमि से संबंधित कानूनी प्रतिबंधों की पड़ताल की थी? क्या नामांतरण आदेश के आधार पर आगे की रजिस्ट्रियों का रास्ता खुला? यदि शुरुआती नामांतरण ही नियमों के विपरीत पाया जाता है, तो उसके आधार पर हुए बाद के हस्तांतरणों की कानूनी स्थिति क्या होगी?
कहीं शासकीय भूमि पर कब्जे के आरोप, तो कहीं आदिवासी जमीन का कथित खेल!
पेंड्रा क्षेत्र में जमीन से जुड़े मामलों को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कहीं शासकीय भूमि पर कथित अवैध कब्जे की शिकायतें हैं, तो कहीं आदिवासी भूमि के गैर-आदिवासियों के नाम दर्ज होने और उसके बाद खरीद-बिक्री के आरोप सामने आ रहे हैं। पतगवां का यह मामला भी राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली और जमीन के रिकॉर्ड में हुए बदलावों की निष्पक्ष जांच की मांग करता है।
प्रशासन से जवाब मांगते बड़े सवाल
पतगवां की संबंधित भूमि का मूल खसरा रिकॉर्ड क्या कहता है? नामांतरण किस प्रकरण क्रमांक और किस कानूनी आधार पर किया गया? संबंधित राजस्व अधिकारियों ने आदिवासी भूमि के हस्तांतरण संबंधी प्रतिबंधों का परीक्षण किया था या नहीं? नामांतरण के बाद कितने विक्रय पत्र पंजीकृत हुए? क्या सभी रजिस्ट्रियों के समय भूमि की मूल आदिवासी स्थिति की जांच की गई?
इन सभी बिंदुओं पर कलेक्टर और राजस्व विभाग को मूल अभिलेखों के आधार पर जांच करानी चाहिए। नामांतरण प्रकरण, आदेश पत्रक, खसरा-बी1, पंजीकृत विक्रय पत्रों और संबंधित राजस्व प्रतिवेदनों की जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए। अब सवाल यह है कि आदिवासी भूमि के संरक्षण के लिए बने कानूनी प्रावधानों का पालन सुनिश्चित होगा या पतगवां का यह मामला भी राजस्व विभाग की फाइलों में उलझकर रह जाएगा?







