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‘निराधार’ का खेल या सेटिंग का कमाल? कोरबा आबकारी और “यू-टर्न” मीडिया पर उठे तीखे सवाल?

एक ही खबर के दो चेहरे—मीडिया की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्न

कोरबा। पाली ब्लॉक में पदस्थ आबकारी उप निरीक्षक सुकांत पांडेय को लेकर उठा विवाद अब एक साधारण प्रशासनिक मामला नहीं रह गया है। यह मामला अब उस दौर की कहानी बनता जा रहा है, जहां आरोप भी सुर्खियां बनते हैं और उन्हीं आरोपों को “निराधार” बताकर पलट देना भी उतनी ही तेजी से हो जाता है। इस पूरे घटनाक्रम ने न केवल आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि मीडिया की विश्वसनीयता को भी कठघरे में ला खड़ा किया है।

आरोपों की शुरुआत: वसूली, नेटवर्क और संरक्षण के गंभीर दावे

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शुरुआत में कुछ मीडिया संस्थानों ने खबरें प्रकाशित करते हुए यह आरोप लगाए कि पाली ब्लॉक में तैनात उप निरीक्षक सुकांत पांडेय अवैध वसूली के खेल में शामिल हैं। खबरों में यह तक कहा गया कि देशी और अंग्रेजी शराब, महुआ दारू और गांजा कारोबार से जुड़े लोगों से नियमित रूप से पैसे लिए जा रहे हैं।

इन रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया कि एक संगठित नेटवर्क के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में वसूली की व्यवस्था बनाई गई है, जहां कथित तौर पर दलालों के जरिए रकम तय होती है और फिर सीधे या परोक्ष रूप से लेनदेन किया जाता है। यहां तक कि डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल की बातें भी सामने रखी गईं।

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इन आरोपों के साथ यह नैरेटिव भी गढ़ा गया कि पाली क्षेत्र में अवैध शराब और नशे का कारोबार बढ़ने के पीछे यह कथित संरक्षण जिम्मेदार है, जिससे स्थानीय लोगों में आक्रोश है और कार्रवाई की मांग उठ रही है।

अचानक यू-टर्न: “सब कुछ निराधार” घोषित

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लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया, जब वही मीडिया संस्थान, जिन्होंने इन गंभीर आरोपों को प्रमुखता से प्रकाशित किया था, अचानक अपने ही खबरों से पीछे हट गए।  बिना किसी विस्तृत जांच रिपोर्ट, बिना ठोस तथ्यों के सार्वजनिक प्रस्तुतीकरण के—सीधे यह कह दिया गया कि सुकांत पांडेय पर लगे सभी आरोप “निराधार” हैं।

यहीं से पूरे मामले ने नया रूप ले लिया। अब सवाल सिर्फ आरोपों का नहीं, बल्कि उस प्रक्रिया का है जिसके तहत आरोप लगाए गए और फिर खारिज कर दिए गए।

पाली–चैतमा की जमीन पर उठते सवाल: धरपकड़ या सेटिंग?

पाली और चैतमा क्षेत्र में यह मामला लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। यहां लंबे समय से यह धारणा बनती जा रही है कि आबकारी विभाग की कार्रवाई एक समान नहीं होती।

स्थानीय स्तर पर यह कहा जा रहा है कि कुछ जगहों पर कार्रवाई बेहद सख्त दिखाई देती है, जबकि कुछ स्थानों पर सब कुछ सामान्य बना रहता है। इस असमानता ने लोगों के बीच यह सोच मजबूत कर दी है कि कार्रवाई कहीं नियमों से नहीं, बल्कि “सेटिंग” से तय हो रही है। हालांकि इन बातों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार सामने आ रही चर्चाएं और अनुभव इस धारणा को खत्म नहीं कर पा रहे।

सिस्टम पर सवाल: नियम से चल रहा है या रिश्तों से?

जिले में आबकारी विभाग को लेकर पहले भी कई बार यह सवाल उठते रहे हैं कि क्या कार्रवाई पूरी तरह नियमों के आधार पर हो रही है या फिर इसमें स्थानीय समीकरण और “तालमेल” भी भूमिका निभाते हैं। वर्तमान घटनाक्रम ने इन सवालों को और धार दे दी है। जब एक ही अधिकारी को लेकर इतने गंभीर आरोप सामने आते हैं और फिर अचानक उन्हें निराधार बताया जाता है, तो यह स्वाभाविक है कि लोग पूरे सिस्टम पर ही सवाल उठाएं।

मीडिया की साख पर गहरा असर

इस पूरे प्रकरण का सबसे संवेदनशील पहलू मीडिया की भूमिका है। पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, जहां निष्पक्षता और तथ्य सर्वोपरि होते हैं। लेकिन जब एक ही संस्थान पहले गंभीर आरोपों को प्रमुखता से प्रकाशित करता है और फिर बिना स्पष्ट आधार के उन्हें खारिज कर देता है, तो यह स्थिति सिर्फ एक खबर की नहीं रहती—यह भरोसे का संकट बन जाती है। अब यह बहस तेज हो चुकी है कि क्या खबरें तथ्यों के आधार पर बनाई जा रही हैं या फिर किसी दबाव, प्रभाव या “मैनेजमेंट” के तहत उनका रुख बदला जा रहा है।

विभाग के भीतर सन्नाटा: संयोग या संकेत?

सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले को लेकर विभाग के भीतर भी असहजता का माहौल है। लेकिन कोई भी अधिकारी या कर्मचारी खुलकर सामने आने को तैयार नहीं है। यह खामोशी अब कई तरह के संकेत दे रही है। क्या यह सिर्फ एक सामान्य प्रशासनिक स्थिति है, या फिर इसके पीछे कोई दबाव काम कर रहा है—यह सवाल अब और गहरा हो गया है।

जांच की मांग और जनता का बढ़ता असंतोष

पाली और आसपास के क्षेत्रों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर लोगों के बीच असंतोष भी देखने को मिल रहा है। लोग अब यह मांग कर रहे हैं कि पूरे मामले की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाए, ताकि सच्चाई सामने आ सके। लोगों का कहना है कि यदि आरोप गलत हैं तो उन्हें तथ्यों के साथ खारिज किया जाए, और यदि सही हैं तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

निष्कर्ष: सच दबा या सच बदला?

कोरबा का यह मामला अब सिर्फ एक अधिकारी या एक खबर का नहीं रह गया है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा बन चुका है, जहां सच सामने आने से पहले ही उसका रूप बदल जाता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या आरोप सच में निराधार थे, या फिर हालात ऐसे बने कि उन्हें निराधार बना दिया गया?

जब तक इस सवाल का स्पष्ट और पारदर्शी जवाब नहीं मिलता, तब तक यह विवाद थमने वाला नहीं है।

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