KORBA: पसान में सरकारी जमीन पर कब्जे का खेल? भू-माफिया के दावे से भड़का विवाद, आंगनबाड़ी निर्माण रोकने की कोशिश के आरोप
तत्कालीन घोटालेबाज पटवारी मोहन दिवाकर ने दस्तावेजों में कूटरचना कर किया फर्जीवाड़ा?

कोरबा जिले के पसान नगर में निर्माणाधीन शासकीय आंगनबाड़ी केंद्र को लेकर अब बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। मामला सिर्फ जमीन स्वामित्व का नहीं, बल्कि कथित राजस्व घोटाले, सरकारी भूमि को निजी बताने और भू-माफियाओं की सक्रियता तक पहुंच गया है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि जिस भूमि पर आज निजी स्वामित्व का दावा किया जा रहा है, वह सैकड़ों वर्षों से शासकीय भूमि रही है और पूर्व में कथित मिलीभगत के जरिए उसे निजी नाम पर दर्ज कराया गया।
ग्रामीणों और स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वर्षों तक जिस जमीन को सरकारी भूमि माना जाता रहा, अचानक वह निजी कैसे हो गई? आखिर किस प्रक्रिया और किन दस्तावेजों के आधार पर भूमि का स्वरूप बदला गया? यही सवाल अब पूरे पसान क्षेत्र में चर्चा का विषय बन चुका है।

“घोटालेबाज पटवारी” से मिलीभगत के आरोप
स्थानीय सूत्रों का दावा है कि पूर्व के वर्षों में तत्कालीन पटवारी मोहन दिवाकर की कथित मिलीभगत से उक्त भूमि को नियम विरुद्ध तरीके से निजी नाम पर दर्ज कराया गया। आरोप है कि राजस्व रिकॉर्ड में फर्जी उत्पत्ति और संदिग्ध प्रविष्टियों के जरिए सरकारी भूमि को निजी स्वामित्व दर्शाने का खेल किया गया। अब जब उसी भूमि पर शासन द्वारा आंगनबाड़ी केंद्र का निर्माण कराया जा रहा है, तो कथित भू-स्वामी और उससे जुड़े लोग निर्माण पर आपत्ति दर्ज कर खुद को भूमि का मालिक बता रहे हैं। इससे पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है।

बड़ा सवाल — सरकारी भूमि निजी कैसे बनी?
क्षेत्रवासियों का कहना है कि:

- यदि भूमि वास्तव में निजी थी, तो दशकों तक सरकारी रिकॉर्ड में उसका स्वरूप अलग क्यों रहा?
- यदि भूमि सरकारी थी, तो निजी नामांतरण कैसे हुआ?
- क्या राजस्व विभाग ने नियमों को ताक पर रखकर रिकॉर्ड में बदलाव किया?
- क्या इसमें भूमाफियाओं और कुछ अधिकारियों की मिलीभगत रही?
लोगों का आरोप है कि यह केवल एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि सरकारी भूमि पर कब्जे और रिकॉर्ड हेरफेर का बड़ा मामला हो सकता है।
आंगनबाड़ी निर्माण पर आपत्ति से बढ़ा विवाद
स्थानीय लोगों का कहना है कि जैसे ही शासकीय आंगनबाड़ी भवन का निर्माण शुरू हुआ, वैसे ही कथित भू-माफिया सक्रिय हो गए और भूमि पर अपना दावा ठोकने लगे। आरोप है कि सरकारी निर्माण को रोकने और प्रशासन पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि यह भूमि वास्तव में निजी होती, तो इतने वर्षों तक किसी ने दावा क्यों नहीं किया? अब सरकारी निर्माण शुरू होते ही आपत्ति उठना कई सवाल खड़े करता है।
निष्पक्ष जांच की मांग तेज
क्षेत्र के नागरिकों और जनप्रतिनिधियों ने मांग की है कि:
- उक्त भूमि के पुराने रिकॉर्ड, खसरा, नक्शा, बी-1 और राजस्व दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं,
- कथित फर्जी प्रविष्टियों और नामांतरण की उच्चस्तरीय जांच हो,
- संबंधित अधिकारियों, कर्मचारियों और कथित भूमाफियाओं की भूमिका की जांच की जाए,
- दोषियों पर आपराधिक मामला दर्ज किया जाए।
प्रशासन की भूमिका पर उठ रहे सवाल
पूरे मामले में प्रशासन की चुप्पी भी लोगों के बीच संदेह बढ़ा रही है। नागरिकों का कहना है कि यदि भूमि वास्तव में सरकारी है तो प्रशासन को तत्काल स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए और यदि रिकॉर्ड में गड़बड़ी हुई है तो दोषियों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। अब सभी की नजर जांच पर टिकी है। आने वाले दिनों में यह साफ हो पाएगा कि मामला केवल भूमि विवाद का है या फिर सरकारी जमीन को निजी बनाने का कोई बड़ा खेल लंबे समय से चलता रहा है।









