गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में कांग्रेस में गुटबाजी तेज, अलग-अलग नियुक्ति पत्रों से मचा बवाल__
एक पद, दो-दो नियुक्ति—संगठन पर सवाल,गुटबाजी की खुली तस्वीर

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही में कांग्रेस की गुटबाजी चरम पर, दो अलग सूचियों से संगठन में घमासान
गौरेला पेंड्रा मरवाही में कांग्रेस संगठन के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आ गई है। मंडल प्रभारियों की नियुक्ति को लेकर जिला कांग्रेस अध्यक्ष और ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा जारी दो अलग-अलग सूचियों ने पार्टी में बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है। दोनों सूचियां सोशल मीडिया में तेजी से वायरल हो रही हैं और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का प्रमुख विषय बन गई हैं।


दो नेताओं की अलग-अलग नियुक्ति, कार्यकर्ता असमंजस में

ब्लॉक कांग्रेस अध्यक्ष प्रशांत श्रीवास्तव ने अपनी ओर से पांच मंडलों के लिए प्रभारियों की घोषणा की। उनके अनुसार—पतगँवा में शंकर पटेल, कोटमी में सतीश शर्मा, कोड़गार में पवन सिंह नागवंश, नवागांव में धर्मेंद्र पैंकरा और पेंड्रा में जयदत्त तिवारी को जिम्मेदारी दी गई है।


वहीं जिला कांग्रेस अध्यक्ष गजमती भानु ने इन्हीं मंडलों के लिए पूरी तरह अलग सूची जारी कर दी। उनकी सूची में पतगँवा में लालचंद सोनवानी और आलोक शुक्ला, कोटमी में मूलचंद कुशराम और गिरजारानी पोटाम, कोड़गार में चंद्रभान मरावी और हर्ष गोयल, नवागांव में अजीत श्याम और संतोष ठाकुर, तथा पेंड्रा में पुष्पराज सिंह और जैलेश सिंह को प्रभारी नियुक्त किया गया है।
एक पद, दो-दो नियुक्ति—संगठन पर सवाल
एक ही पद के लिए अलग-अलग नेताओं की नियुक्ति से जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति बन गई है। कई जगहों पर कार्यकर्ता यह तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे किस प्रभारी के निर्देशों का पालन करें। इससे संगठनात्मक गतिविधियों पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
गुटबाजी की खुली तस्वीर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद कांग्रेस के भीतर लंबे समय से चल रही गुटबाजी का नतीजा है। जिला और ब्लॉक स्तर के नेतृत्व के बीच तालमेल की कमी अब सार्वजनिक रूप से सामने आ गई है। सूत्रों के मुताबिक, दोनों खेमे अपने-अपने समर्थकों को संगठन में जगह दिलाने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके चलते यह टकराव पैदा हुआ है।
सोशल मीडिया में तेज बहस
दोनों सूचियां वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर कार्यकर्ता और समर्थक खुलकर अपनी-अपनी राय रख रहे हैं। कुछ लोग इसे संगठन की कमजोरी बता रहे हैं, तो कुछ इसे आंतरिक लोकतंत्र का हिस्सा मान रहे हैं। हालांकि अधिकांश प्रतिक्रियाओं में नेतृत्व पर समन्वय की कमी को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
हाईकमान की चुप्पी, समाधान का इंतजार
अब तक इस पूरे मामले पर पार्टी के वरिष्ठ नेतृत्व की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। हालांकि अंदरखाने विवाद सुलझाने की कोशिशें जारी बताई जा रही हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते इस मुद्दे को नहीं सुलझाया गया, तो इसका असर आगामी चुनावी तैयारियों पर भी पड़ सकता है।
आगे क्या?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि पार्टी किस सूची को मान्यता देती है और दोनों गुटों के बीच तालमेल कैसे बैठाया जाता है। आने वाले दिनों में कांग्रेस संगठन की एकजुटता की असली परीक्षा होगी।









