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GPM सनसनी (पार्ट 4): व्यवस्था या ‘वसूली तंत्र’? जमानत जब्त जिलाध्यक्ष के ‘चमचों’ की गुंडागर्दी? पैसों और रसूखदारी का ‘पावर हब’ बना मरवाही

पैसों और रसूखदारी का ‘पावर हब’ बना मरवाही राजस्व कारखाना—बड़े अधिकारियों को खरीदने तक की बातें, सिस्टम पर बड़े सवाल?

ब्यूरो रिपोर्ट / रितेश गुप्ता / लल्लनगुरु -गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जब ‘आत्मा’ भी फाइल में हाजिरी लगा दे… तो समझिए सिस्टम कितना ‘जिंदा’ है! पार्ट 1 से 3 तक आपने देखा—एक मृत महिला कागजों में जिंदा हो गई, नामांतरण हुआ और ₹1 करोड़ 20 लाख का सौदा भी निपट गया। अब पार्ट 4 में सवाल और बड़ा है—क्या यह सिर्फ एक केस था… या मरवाही में चल रहे किसी “राजस्व कारखाने” का नमूना? व्यवस्था आम जनता के लिए… या ‘खास लोगों’ के लिए आरक्षित?

कागजों में नियम सबके लिए बराबर हैं, लेकिन जमीनी चर्चा कुछ और ही कहानी कहती है। स्थानीय तंज अब सीधे सिस्टम पर चोट करता है— “आम व्यक्तियों के हित के लिए बनायी गई किसी पार्टी के यहाँ के जिलाध्यक्ष के चमचो की गुंडागर्दी, पैसों और रसूखदारी की पॉवर हब से चल रहा है मरवाही राजस्व कारखाना।” अब यह सिर्फ गुस्सा है… या सच्चाई की झलक?‘चमचे’ या ‘चालक’—फाइल कौन चला रहा है?इलाके में कहा जा रहा है कि असली ताकत अब कुर्सियों में नहीं, बल्कि कुर्सियों के आसपास घूमने वालों में दिखती है।

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फाइल कब आगे बढ़ेगी, कब रुकेगी, और कब मंजूर होगी—यह सब जैसे प्रक्रिया से कम और “पहचान” से ज्यादा तय होता दिख रहा है। तो सवाल सीधा है—क्या सिस्टम चल रहा है… या चलाया जा रहा है?जब दावे इतने बड़े हों… तो शक भी उतना ही बड़ा होता है?स्थानीय चर्चाओं में एक और तंज खूब गूंज रहा है—“बड़े अधिकारियों को खरीदने तक की बात करते दिखते हैं गुर्गे… तो आप समझ सकते हैं क्या हाल है सिस्टम का।”

अगर यह सिर्फ दिखावा है, तो इतना बड़ा दावा क्यों?और अगर इसमें जरा भी सच्चाई है… तो फिर मामला कितना गहरा है?‘राजस्व कारखाना’—जहां कागज तय करते हैं हकीकत?मृत महिला की ‘आत्मा’ का कागजी खेल, करोड़ों का सौदा, और अब ये चर्चाएं—सब मिलकर एक ही तस्वीर दिखाते हैं कि कहीं न कहीं एक ऐसा सिस्टम बन चुका है, जहां कागजों से हकीकत गढ़ी जाती है। यह लापरवाही है…या पूरी तरह से संगठित खेल?

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जनता का तंज—अब जिंदा होने के लिए भी ‘सेटिंग’ चाहिए?जब एक मृत महिला कागजों में जिंदा होकर जमीन बेच सकती है, तो आम आदमी का सवाल भी सीधा है—क्या अब पहचान से ज्यादा जरूरी है “पहचान वाला”?सबसे बड़ा सवाल—क्या खुलेगा पूरा खेल?एक मामला सामने आया… फिर दूसरा… अब पूरा पैटर्न नजर आने लगा है।अगर सही मायनों में जांच हुई, तो क्या सामने आएगा— सिस्टम की गलती… या पूरे नेटवर्क का खेल?

(नोट: यह रिपोर्ट स्थानीय चर्चाओं, व्यंग्यात्मक टिप्पणियों और प्राप्त प्रारंभिक जानकारी पर आधारित है। आधिकारिक जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।)

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Ritesh Gupta

रितेश गुप्ता LallanGuru.in के वरिष्ठ पत्रकार हैं। इन्हें डिजिटल मीडिया में 7 से अधिक वर्षों का अनुभव है। रितेश मुख्य रूप से राजनीति, राष्ट्रीय समाचार और ट्रेंडिंग विषयों पर निष्पक्ष व तथ्य-आधारित (Fact-checked) रिपोर्टिंग करते हैं। उन्होंने पत्रकारिता में मास्टर डिग्री हासिल की है।
  • संपर्क करें: Riteshgupta1204@gmail.com

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