मरवाही में जंगल का ‘महाघोटाला’ उजागर: 122 पेड़ों की कटाई और फरवरी के तस्करी कांड के बाद डीएफओ की कार्यशैली पर गंभीर सवाल, पूरा सिस्टम कठघरे में
हर विवाद में डीएफओ का एक ही जवाब - क्या बन चुका है पैटर्न?

मरवाही/गौरेला-पेंड्रा। मरवाही वनमंडल में सामने आ रहे लगातार मामलों ने पूरे वन तंत्र की नींव हिला दी है। पीपरखूटी बीट में 122 पेड़ों की अवैध कटाई और फरवरी में सामने आए साल (सरई) तस्करी कांड ने अब ऐसी तस्वीर सामने रख दी है, जिसने डीएफओ से लेकर निगरानी व्यवस्था तक पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
122 पेड़ों का सफाया—और सिस्टम को ‘खबर’ तक नहीं?

पीपरखूटी क्षेत्र में 2-3 महीनों तक सागौन और साल जैसे बेशकीमती पेड़ों पर आरा चलता रहा। जांच में 122 ठूंठ मिलने के बाद यह साफ है कि यह कोई सामान्य घटना नहीं, बल्कि सुनियोजित और लंबे समय तक चलने वाला ऑपरेशन था।अगर जंगल कट रहा था, तो सिस्टम क्या कर रहा था? ग्रामीणों की चेतावनी क्यों हुई अनसुनी? स्थानीय लोगों का दावा है कि उन्होंने समय रहते विभाग को सूचना दी थी। लेकिन कार्रवाई नहीं हुई।यहीं से मामला सिर्फ लापरवाही का नहीं, बल्कि गंभीर सवालों के घेरे में आता है— क्या सूचना को नजरअंदाज किया गया या फिर कार्रवाई ही नहीं की गई?
फ्लाइंग स्क्वाड पहुंची तब टूटी चुप्पी

जब मामला रायपुर तक पहुंचा, तब जाकर फ्लाइंग स्क्वाड मौके पर पहुंची। जमीन पर मिले कटे पेड़ों के अवशेषों ने पूरे सिस्टम की निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए। लेकिन देरी से हुई कार्रवाई अब खुद जांच के दायरे में है। फरवरी का साल तस्करी कांड फिर सुर्खियों में ? उषाड़–कटरा–बेलझिरिया क्षेत्र में फरवरी में सामने आया साल (सरई) तस्करी कांड अब फिर चर्चा में है। उस समय ग्रामीणों ने उच्च स्तर तक शिकायत भेजी थी—यहां तक कि प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति स्तर तक आवेदन पहुंचने की बात सामने आई थी।
लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है—

क्या उस गंभीर शिकायत पर पर्याप्त और निष्पक्ष कार्रवाई हुई थी!?हर विवाद में एक ही जवाब—या बन चुका है सिस्टम का ढाल? स्थानीय स्तर पर आरोप है कि हर बार जवाब लगभग एक जैसे होते हैं—“आपसी लेनदेन” या “राजस्व भूमि का मामला”।अब यही जवाब खुद सवाल बन गए हैं— क्या यह वास्तविक स्थिति है, या जिम्मेदारी से बचने का तरीका?
डीएफओ की कार्यशैली पर सबसे बड़ा दबाव
मरवाही वनमंडल की डीएफओ श्रीमती ग्रीष्मी चांद अब लगातार सवालों के केंद्र में हैं। स्थानीय लोगों और सूत्रों का कहना है कि बार-बार सामने आ रहे मामलों के बावजूद अपेक्षित सख्त कार्रवाई नहीं दिखती, जिससे पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर असर पड़ रहा है। हालांकि, किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जांच का विषय है, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम ने विभाग को कटघरे में जरूर खड़ा कर दिया है। डर खत्म या नियंत्रण कमजोर?
लगातार सामने आ रहे मामलों ने यह संकेत दिया है कि क्षेत्र में अवैध कटाई और तस्करी पर नियंत्रण कमजोर पड़ता दिख रहा है। जब कार्रवाई का डर कम होता है, तो ऐसे नेटवर्क और मजबूत हो जाते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल—क्या इस बार सिस्टम जवाब देगा या फिर सवालों में दब जाएगा मामला? 122 पेड़ों की कटाई और फरवरी के तस्करी कांड ने यह साफ कर दिया है कि मामला अब सिर्फ अवैध कटाई का नहीं रहा, बल्कि पूरे वन तंत्र की जवाबदेही पर सवाल बन चुका है।?









