कटघोरा में जमीन घोटाला: अनिल अग्रवाल का फर्जीवाड़ा उजागर, आदिवासी की जमीन पर ‘कागजी खेल’ से खड़ा हुआ 40 करोड़ का साम्राज्य
फर्जीवाड़े की पटकथा: कागजों में बदल गई जमीन की किस्मत

Korba: कटघोरा तहसील में सामने आया यह मामला अब सीधे-सीधे बड़े फर्जीवाड़े की तस्वीर पेश कर रहा है, जहां अनिल अग्रवाल और उनके नेटवर्क पर गंभीर आरोप लगे हैं। आदिवासी जमीन, जिसे कानून विशेष संरक्षण देता है, उसे कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के जरिए गैर-आदिवासियों के नाम दर्ज करा दिया गया। शिकायतकर्ता का कहना है कि वर्ष 2020 में दर्ज प्रकरण के दौरान पूरी सुनियोजित साजिश के तहत नकली कागज पेश कर जमीन की असल पहचान ही बदल दी गई।
न्यायालय को गुमराह करने का आरोप: कानून बना ‘हथियार’

इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग को लेकर उठ रहा है। आरोप है कि अनिल अग्रवाल ने कानून की धाराओं को ही हथियार बनाकर इस्तेमाल किया और न्यायालय को गुमराह किया। भू-राजस्व संहिता की धारा 170 (ख) के तहत चल रही कार्यवाही को मोड़कर आदिवासी भूमि को गैर-आदिवासी के नाम पर दर्ज कराने की कोशिश की गई।
दुलीचंद बना मोहरा: गरीब के नाम पर रचा गया खेल

फर्जीवाड़े की इस कहानी में एक गरीब बीपीएल कार्डधारी दुलीचंद को मोहरा बनाए जाने का आरोप है। उसके नाम पर जमीन की रजिस्ट्री कराई गई, जबकि उसे खुद इस सौदे की जानकारी तक नहीं थी। बाद में दुलीचंद के बयान ने पूरे खेल की पोल खोल दी, जिसमें उसने साफ कहा कि वह इस जमीन के बारे में कुछ नहीं जानता। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि पूरा खेल पर्दे के पीछे से संचालित किया गया।
दानेंद्र प्रताप सिंह के नाम पर फिर रजिस्ट्री: कागजों में घूमती रही जमीन

मामले को और उलझाने के लिए जमीन को तीसरे व्यक्ति दानेंद्र प्रताप सिंह (पिता बालेवर प्रताप सिंह) के नाम पर फिर से रजिस्ट्री कर दी गई। इस तरह एक ही जमीन को बार-बार कागजों में घुमाकर असली मालिक को पूरी तरह से किनारे कर दिया गया। यह सिलसिला बताता है कि फर्जीवाड़ा एक बार नहीं, बल्कि चरणबद्ध तरीके से अंजाम दिया गया।
करोड़ों का खेल: जमीन पर खड़े हो गए उद्योग और आलीशान मकान
जिस जमीन पर विवाद चल रहा है, उसी पर अब करीब 40 करोड़ रुपये का निवेश कर राइस मिल, मकान और अन्य औद्योगिक संस्थान खड़े कर दिए गए हैं। यह दर्शाता है कि कब्जा सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जमीन पर स्थायी रूप से स्थापित कर लिया गया।
प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया पर बड़े सवाल
मामले में यह भी सामने आया है कि वर्ष 2022 में आयुक्त न्यायालय बिलासपुर में चल रहे प्रकरण को वापस ले लिया गया और स्थानीय स्तर पर चल रही कार्यवाही को प्रभावित किया गया। इसके बाद जमीन की फिर से रजिस्ट्री होने से पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
‘भूमि माफिया’ का जाल: क्या मिलीभगत से हुआ खेल?
शिकायतकर्ता ने इसे सीधा ‘भूमि माफिया’ का मामला बताते हुए आरोप लगाया है कि बिना अंदरूनी सहयोग के इतना बड़ा खेल संभव नहीं है। जिस तरीके से दस्तावेज तैयार हुए, नाम बदले गए और निर्माण कार्य हुआ, वह एक संगठित नेटवर्क की ओर इशारा करता है।
कार्रवाई की मांग: अब प्रशासन की अग्निपरीक्षा
शिकायतकर्ता ने अनिल अग्रवाल, उनके भाइयों, दुलीचंद और दानेंद्र प्रताप सिंह सहित सभी संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की मांग की है। साथ ही आदिवासी जमीन को उसके मूल मालिक को वापस दिलाने की भी अपील की गई है। अब यह मामला सिर्फ एक शिकायत नहीं, बल्कि प्रशासन के लिए अग्निपरीक्षा बन गया है—क्या अनिल अग्रवाल के इस कथित फर्जीवाड़े पर सख्त कार्रवाई होगी या फिर यह मामला भी सिस्टम की फाइलों में दबकर रह जाएगा?









