मरवाही – ‘सेटिंग या सिंडिकेट’? क्या है—तंबोली कनेक्शन, घोटाले के बदले कार्रवाई नहीं, मिला ‘इनाम’?—मरवाही में घोटाले के बाद अब पेंड्रा रोड की बागडोर?
सूत्रों का दावा: डाइवर्सन प्रक्रिया को मोड़ने का सुनियोजित प्रयास

मरवाही | विशेष रिपोर्ट – मरवाही अनुभाग में सामने आया डाइवर्सन का एक मामला अब सीधे-सीधे सवाल खड़ा कर रहा है—क्या यह सिर्फ लापरवाही है या फिर पूरा “सेटिंग सिस्टम” काम कर रहा था? सूत्रों के हवाले से जिस तरह के तथ्य सामने आ रहे हैं, उन्होंने इस पूरे मामले को “व्यवस्थित सिंडिकेट” की आशंका तक पहुंचा दिया है।
कागजों में वैध, जमीन पर संदिग्ध—यहीं से शुरू होता है शक

तहसील सकोला के ग्राम पंचायत मड़ई की भूमि, खसरा नंबर 236/7, रकबा 2.023 हेक्टेयर का वर्ष 2022 में डाइवर्सन किया गया। पहली नजर में सब कुछ नियमों के तहत दिखाया गया, लेकिन जैसे-जैसे फाइल की परतें खुल रही हैं, मामला उल्टा नजर आने लगा है। सूत्रों का दावा है कि यह “सिर्फ डाइवर्सन नहीं, बल्कि फाइल मैनेजमेंट का केस” हो सकता है।
NOC गायब—सबसे बड़ा ‘रेड फ्लैग’

RTI में सामने आया कि फाइल में पंचायत का NOC ही नहीं है।यहीं से पूरा मामला संदेह के घेरे में आ जाता है। सूत्रों के अनुसार, बिना NOC के डाइवर्सन आदेश जारी होना संभव ही नहीं है।
ऐसे में अब सीधा सवाल खड़ा है—

क्या NOC कभी था ही नहीं, या फिर जानबूझकर हटाया गया?अगर दूसरा सच है, तो यह सीधा-सीधा दस्तावेजी हेरफेर का मामला बनता है। मड़ई की जमीन, सेखवा पंचायत—गलती या ‘गेम प्लान’?
मामले का सबसे चौंकाने वाला हिस्सा यह है कि जमीन मड़ई पंचायत में है, लेकिन प्रक्रिया में सेखवा पंचायत का जिक्र किया गया। सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि मड़ई पंचायत से NOC मिलना आसान नहीं था, इसलिए कथित तौर पर “सेखवा का रास्ता” अपनाया गया। यह कोई सामान्य तकनीकी त्रुटि नहीं लगती।
यह सवाल खड़ा करता है—
क्या प्रक्रिया को जानबूझकर दूसरी दिशा में मोड़ा गया?”तंबोली कनेक्शन’—सिस्टम के भीतर की कड़ी? सूत्रों के अनुसार, जिस समय यह पूरा डाइवर्सन हुआ, उस दौरान तंबोली मरवाही SDM कार्यालय की डाइवर्सन शाखा में पदस्थ थे।
वर्तमान में उनके पेंड्रा रोड में पदस्थ होने की जानकारी सामने आ रही है। डाइवर्सन शाखा वह जगह है जहां से पूरी फाइल गुजरती है— जांच, सत्यापन, NOC की पुष्टि और अंतिम आदेश तक। ऐसे में सूत्रों का कहना है कि: इतनी बड़ी प्रक्रिया बिना अंदरूनी स्तर पर “क्लीयरेंस” के संभव नहीं लगती।
सिर्फ चूक नहीं—‘सिंडिकेट स्टाइल ऑपरेशन’ की आशंका
राजस्व मामलों के जानकारों के हवाले से यह बात सामने आ रही है कि: NOC का गायब होना और गलत पंचायत का इस्तेमाल—दोनों का एक साथ होना संयोग नहीं माना जा सकता। सूत्रों के अनुसार, यह पूरा मामला “सिंडिकेट स्टाइल ऑपरेशन” जैसा दिखता है, जहां प्रक्रिया को जरूरत के हिसाब से मोड़ा गया।
स्थानीय स्तर पर उबाल—जांच की मांग तेज मामला सामने आने के बाद क्षेत्र में चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक, नागरिकों, शिकायतकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों ने इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग उठाई है।
जांच हुई तो खुल सकते हैं कई राज? सूत्रों के अनुसार, अगर निष्पक्ष जांच होती है तो यह सिर्फ एक फाइल तक सीमित नहीं रहेगा। इसमें दस्तावेजों की वास्तविक स्थिति, NOC की सच्चाई, उद्घोषणा की प्रक्रिया और उस समय पदस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका सब सामने आ सकती है।
बड़े सवाल—जवाब अब भी गायब? पूरा मामला कई गंभीर सवाल छोड़ रहा है— बिना NOC डाइवर्सन कैसे हुआ? मड़ई की जमीन के लिए सेखवा पंचायत क्यों लाई गई? क्या दस्तावेजों में बाद में छेड़छाड़ हुई? और सबसे अहम—क्या यह पूरा मामला “सेटिंग” था या फिर एक संगठित “सिंडिकेट”?
अब प्रशासन की साख दांव पर- यह मामला अब सिर्फ एक जमीन डील नहीं रहा। यह सीधे-सीधे राजस्व तंत्र की विश्वसनीयता और पारदर्शिता पर सवाल बन चुका है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस पर सख्त कार्रवाई करता है या फिर यह मामला भी फाइलों के ढेर में दबा दिया जाएगा।









