गौरेला-पेंड्रा-मरवाही: सरकारी जमीन की ‘कागजी लूट’! खसरा 1439 में दशकों से चलता खेल बेनकाब, 1.16 को 3.61 बनाने तक पहुंचा फर्जीवाड़ा?“…कई अधिकारी जांच के घेरे में”?”
1929-30 की 35.60 एकड़ जंगल मद भूमि को टुकड़ों में तोड़कर निजी खातों में बांटने का आरोप, रिकॉर्ड में हेरफेर के पुख्ता संकेत; सिस्टम पर सीधा सवाल

गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। तहसील सकोला के ग्राम सेखवा से जो मामला सामने आया है, वह सिर्फ राजस्व गड़बड़ी नहीं—बल्कि सरकारी जमीन की “कागजी लूट” का बड़ा उदाहरण बनता जा रहा है। खसरा नंबर 1439, जो कभी 35.60 एकड़ की शासकीय “बड़े झाड़ जंगल मद” जमीन थी, आज रिकॉर्ड में बिखरकर निजी खातों में समाती नजर आ रही है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब एक-दो साल में नहीं, बल्कि दशकों तक चरणबद्ध तरीके से किया गया—और जिम्मेदार सिस्टम या तो सोता रहा या फिर आंखें मूंदे रहा।

1929 में पूरी सरकारी जमीन, फिर कैसे ‘गायब’ हो गई?
मूल रिकॉर्ड साफ बताते हैं कि 1929-30 में खसरा 1439 पूरी तरह शासकीय था। एक इंच जमीन भी निजी नहीं थी। लेकिन 1954-55 से शुरू हुआ “खेल” 2013-14 तक आते-आते पूरी तस्वीर ही बदल देता है। हर कुछ वर्षों में खसरे को तोड़ा गया, नए हिस्से बनाए गए, और धीरे-धीरे निजी नाम जोड़े गए।

सवाल यह है—
क्या सरकारी जमीन ऐसे ही कागजों में बांटी जाती है? बिना आदेश, बिना प्रक्रिया—फिर भी बदलते रहे रिकॉर्ड

आरोप सीधे हैं—
कई बदलावों के पीछे न तो सक्षम अधिकारी का आदेश है, न ही कोई वैधानिक प्रक्रिया। अगर यह सच है, तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं— यह सीधा सरकारी रिकॉर्ड से छेड़छाड़ और सत्ता के दुरुपयोग का मामला है। और अगर आदेश हैं, तो वे सामने क्यों नहीं आ रहे?
1.16 को 3.61—यहीं से खुलती है पूरी पोल
इस पूरे घोटाले की सबसे बड़ी कड़ी खसरा नंबर 1439/10 है।रिकॉर्ड के मुताबिक, इसका रकबा पहले 1.16 एकड़ था—लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 3.61 एकड़ कर दिया गया।यानी कागजों में ही जमीन लगभग तीन गुना कर दी गई।
अब सबसे बड़ा सवाल—ये अतिरिक्त 2.45 एकड़ जमीन आई कहां से?क्या यह शासकीय जमीन से काटकर जोड़ी गई?अगर हां, तो यह सिर्फ गड़बड़ी नहीं—
यह सरकारी जमीन की खुली लूट है। हर बदलाव में एक ही पैटर्न—सरकारी घटती, निजी बढ़ती पूरा रिकॉर्ड एक ही कहानी बयान करता है—हर संशोधन के साथ “जंगल मद” की जमीन घटती गई और निजी खातों में बढ़ती गई। कुछ जगहों पर तो कुल रकबा ही बढ़ा हुआ दिखाया गया—जो साफ संकेत देता है कि मामला सिर्फ गलती नहीं, बल्कि सुनियोजित खेल हो सकता है।
क्या बिना मिलीभगत के संभव है इतना बड़ा खेल? यहां सबसे बड़ा सवाल सिस्टम पर है। क्या इतने सालों तक बिना राजस्व अधिकारियों, कर्मचारियों और जिम्मेदार लोगों की मिलीभगत के यह सब संभव है? अगर नहीं—तो जिम्मेदार कौन? और अगर हां—तो अब तक कार्रवाई क्यों नहीं? आवेदन में सीधे आरोप—फर्जीवाड़ा, कूट रचना और जमीन घोटाला
इस पूरे मामले को आवेदन में साफ तौर पर फर्जीवाड़ा, कूट रचना और शासकीय संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसा गंभीर अपराध बताया गया है। यानी मामला अब सिर्फ प्रशासनिक जांच का नहीं, बल्कि आपराधिक जिम्मेदारी तय करने का बन चुका है। जमीन वापस करो या जवाब दो—प्रशासन घिरा आवेदक ने साफ मांग रखी है—खसरा 1439 को उसकी मूल स्थिति 35.60 एकड़ “जंगल मद” में बहाल किया जाए, और सभी अवैध प्रविष्टियों को रद्द किया जाए।
साथ ही दोषी अधिकारियों-कर्मचारियों पर सख्त कार्रवाई की मांग भी की गई है। अब या तो कार्रवाई होगी, या सच दबेगायह मामला अब प्रशासन के लिए सीधी चुनौती बन चुका है।अगर निष्पक्ष जांच होती है, तो कई बड़े नाम सामने आ सकते हैं।और अगर नहीं—तो यह मान लेना चाहिए कि सरकारी जमीन की ‘कागजी लूट’ पर सिस्टम खुद चुप्पी साधे बैठा है। अब सबसे बड़ा सवाल— क्या जमीन वापस मिलेगी, या फाइलों में ही गायब होती रहेगी?









