15वें वित्त में करोड़ों का खेल! “असली गुनहगार गायब, सच उजागर करने वाले ही निशाने पर”मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) मुकेश रावटे पर गंभीर आरोप?
6 महीने पहले खुला घोटाला अब भी ठंडे बस्ते में, ऑपरेटर लापता… कार्रवाई शून्य, उल्टा सरपंच-सचिवों पर दबाव—प्रशासन की भूमिका पर बड़े सवाल

गौरेला–पेंड्रा–मरवाही।
जिले में 15वें वित्त आयोग की राशि को लेकर सामने आया कथित करोड़ों का घोटाला अब प्रशासन की कार्यशैली पर ही सवाल खड़े कर रहा है। मामला जितना पुराना होता जा रहा है, उतना ही उलझता दिख रहा है—और सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिन लोगों ने घोटाले का खुलासा किया, अब वही जांच के घेरे में खड़े किए जा रहे हैं।

करीब 6 महीने पहले 8 से अधिक पंचायतों के सरपंच और सचिव सामने आए थे। उन्होंने खुलकर आरोप लगाया था कि 15वें वित्त की राशि में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है और इसमें जनपद स्तर के अधिकारी शामिल हैं। उस समय कड़ी कार्रवाई की मांग भी उठी, लेकिन आज तक उस मामले का कोई ठोस निष्कर्ष सामने नहीं आया।
ई-ग्राम स्वराज से छेड़छाड़, OTP खेल से हुआ भुगतान

शिकायत में खुलासा हुआ कि ई-ग्राम स्वराज पोर्टल में सचिवों के ई-मेल और मोबाइल नंबर बदलकर कंप्यूटर ऑपरेटर का नंबर डाल दिया गया। इसके बाद पूरा भुगतान सिस्टम उसी के नियंत्रण में चला गया। ओटीपी तक सरपंच-सचिवों को नहीं मिला और पंचायत खातों से सीधे वेंडरों को रकम ट्रांसफर कर दी गई—वह भी बिना अधिकृत जानकारी के।
डीएससी का दुरुपयोग, बिना आदेश ट्रांजैक्शन

मामले में यह भी आरोप है कि डिजिटल सिग्नेचर (DSC) का उपयोग भी संदिग्ध तरीके से किया गया। बिना किसी लिखित आदेश और पारदर्शिता के फंड ट्रांसफर किए गए। इससे पूरा वित्तीय सिस्टम ही सवालों के घेरे में आ गया है।
मुख्य आरोपी ऑपरेटर दीपक जायसवाल लापता
सबसे बड़ा सवाल उस कंप्यूटर ऑपरेटर को लेकर है, जिस पर इस पूरे खेल की कड़ी होने का आरोप है। दीपक जायसवाल आज तक लापता बताया जा रहा है। “उसे जमीन खा गई या आसमान निगल गया”—यह सवाल अब सिर्फ पंचायत प्रतिनिधियों का नहीं, बल्कि पूरे जिले का बन चुका है।
FIR नहीं, कार्रवाई नहीं… आखिर किसे बचाया जा रहा?
हैरानी की बात यह है कि करोड़ों के इस कथित घोटाले में अब तक न कोई ठोस नामजद FIR दर्ज हुई और न ही जनपद के तत्कालीन सीईओ खोटेल पर कोई कार्रवाई की गई। जबकि आरोप है कि इसी स्तर से पूरे घोटाले की नींव रखी गई और साजिश को अंजाम दिया गया।
अब शिकायतकर्ताओं पर ही दबाव!
सबसे गंभीर आरोप यह है कि अब सरपंचों और सचिवों को ही अलग-अलग बुलाकर उन्हें आरोपी ठहराया जा रहा है। जिले के मुख्य कार्यपालन अधिकारी पर आरोप है कि वे शिकायतकर्ताओं को मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं, जिससे पूरे मामले की दिशा ही बदलती नजर आ रही है।
“सेटिंग” की चर्चाएं, भरोसे पर सवाल
जिस तरह असली आरोपियों पर कार्रवाई नहीं हो रही और शिकायतकर्ताओं पर दबाव बनाया जा रहा है, उससे पूरे घटनाक्रम पर संदेह गहरा गया है। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि मामले को दबाने के लिए “ऊपर तक सेटिंग” की गई है और मोटी रकम के लेन-देन की बातें सामने आ रही हैं। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं है, लेकिन हालात कई गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
8 पंचायतों में विकास ठप, जनता परेशान
इस पूरे विवाद का सीधा असर विकास कार्यों पर पड़ा है। कई पंचायतों में वित्तीय लेन-देन रुक गया है, जिससे निर्माण और जनहित के काम ठप हो चुके हैं। आम जनता अब इस लड़ाई की कीमत चुका रही है।
प्रशासन की चुप्पी या संरक्षण?
एक तरफ करोड़ों के घोटाले के आरोप, दूसरी तरफ मुख्य आरोपी का गायब होना, और अब तक किसी बड़े अधिकारी पर कार्रवाई न होना—यह सब प्रशासन की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े करता है। क्या यह महज लापरवाही है या फिर किसी को बचाने की कोशिश?
आंदोलन की चेतावनी
सरपंच-सचिव संघ ने साफ कर दिया है कि अगर निष्पक्ष जांच और दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो वे आंदोलन का रास्ता अपनाएंगे।
15वें वित्त का यह मामला अब सिर्फ वित्तीय अनियमितता नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन चुका है।
अब देखना होगा—सच सामने आएगा या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन कर दिया जाएगा।









