कटघोरा महाघोटाला (पार्ट–2): “50 रुपये के स्टाम्प से बना ‘कानून’, नक्शे में उगी सड़क—दो चरणों में रचा गया जमीन का खेल!”?
तत्कालीन पटवारी सुखसागर दास महंत पर रिकॉर्ड में हेरफेर का आरोप, वर्तमान पटवारी आदित्य ने नक्शे में दिखाई ‘फर्जी रोड’—दो चरणों में रचा गया पूरा खेल!

कटघोरा महाघोटाला (पार्ट–2): “50 रुपये के स्टाम्प से हक त्याग, नक्शे में सड़क—शाहिद मोहम्मद और पटवारी तंत्र पर बड़ा आरोप”
कोरबा जिले के कटघोरा में सामने आया जमीन घोटाला अब खुलकर उस संगठित फर्जीवाड़े की कहानी बयान कर रहा है, जिसमें एक व्यक्ति और पटवारी तंत्र की कथित मिलीभगत से कानून को कागजों में मोड़ दिया गया। इस मामले में विक्रेता शाहिद मोहम्मद का नाम सामने आ रहा है, जिस पर आरोप है कि उसने जमीन को “मेन रोड प्रॉपर्टी” दिखाने के लिए फर्जी हक त्याग और दस्तावेजी हेरफेर का पूरा खेल रचा। इस पूरे घोटाले को समझने के लिए इसकी दो परतों को देखना जरूरी है—पहली परत हक त्याग की, और दूसरी नक्शे में सड़क दिखाने की।

पहली परत वहीं से शुरू होती है, जहां कानून की सबसे बुनियादी प्रक्रिया को ही दरकिनार कर दिया गया। आरोप है कि शाहिद मोहम्मद ने जमीन से जुड़ी हिस्सेदारी को खत्म करने के लिए सिर्फ 50 रुपये के स्टाम्प पेपर पर लिखापढ़ी कर हक त्याग दिखा दिया, जबकि नियम साफ कहते हैं कि हक त्याग तभी मान्य होता है जब वह विधिवत रजिस्ट्री के जरिए दर्ज हो। बिना रजिस्ट्री के ऐसा कोई दस्तावेज कानूनी आधार नहीं बन सकता।
इसके बावजूद, आरोप यह है कि तत्कालीन पटवारी सुखसागर दास महंत ने इसी कथित फर्जी हक त्याग को आधार बनाकर राजस्व रिकॉर्ड में बदलाव कर दिया और पूरी जमीन को एक ही व्यक्ति के नाम पर दर्ज कर दिया। यह वही बिंदु है, जहां पूरा मामला गंभीर हो जाता है—क्योंकि सवाल उठता है कि एक अवैध दस्तावेज सरकारी रिकॉर्ड का आधार कैसे बन गया?

इस प्रक्रिया से सिर्फ जमीन का मालिकाना ही नहीं बदला, बल्कि सरकार को राजस्व की सीधी हानि भी हुई। अगर यह हक त्याग विधिवत रजिस्ट्री के जरिए होता, तो सरकार को स्टाम्प ड्यूटी और रजिस्ट्रेशन फीस मिलती। लेकिन कथित तौर पर 50 रुपये के स्टाम्प में पूरा काम निपटा दिया गया—और नियमों को खुलेआम नजरअंदाज कर दिया गया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। असली खेल इसके बाद शुरू होता है।
जब जमीन एक ही नाम पर आ गई, तब दूसरा चरण शुरू हुआ—जमीन को सड़क से जुड़ा दिखाने का। आरोप है कि वर्तमान पटवारी आदित्य ने राजस्व नक्शे में संशोधन करते हुए उस भूमि को “रोड टच” दर्शा दिया, जबकि मौके पर कोई सड़क मौजूद नहीं है। यह सिर्फ एक लाइन खींचने का मामला नहीं, बल्कि जमीन की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह बदल देने का आरोप है। अब हालात ऐसे हैं कि जमीन पर जाकर देखने पर वहां कोई सड़क नहीं मिलती, लेकिन सरकारी नक्शा और दस्तावेज उस जमीन को “मेन रोड” बताते हैं। यह विरोधाभास ही इस पूरे घोटाले की सबसे बड़ी पहचान बन चुका है।

पूरे घटनाक्रम को जोड़कर देखें तो एक साफ पैटर्न सामने आता है। पहले फर्जी हक त्याग के जरिए जमीन को एक नाम पर लाया गया, फिर नक्शे में सड़क दिखाकर उसकी वैल्यू बढ़ाई गई, और आखिर में रजिस्ट्री कर इस पूरे खेल को वैधता का रूप देने की कोशिश की गई। यह सब कुछ इतनी सुनियोजित तरीके से हुआ कि पहली नजर में सब कुछ नियमों के तहत नजर आता है, लेकिन गहराई में जाने पर पूरा मामला सवालों से घिर जाता है।
व्यंग्य यह है कि यहां विकास जमीन पर नहीं, बल्कि कागजों में हुआ है। सड़क नहीं बनी, लेकिन दिखा दी गई। रास्ता नहीं था, लेकिन बना दिया गया। और जब कागजों में सब कुछ “ठीक” नजर आने लगा, तो सिस्टम ने भी आंखें बंद कर लीं।
अब सवाल सिर्फ शाहिद मोहम्मद या पटवारी तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे तंत्र की भूमिका पर उठ रहा है। क्या यह सब बिना किसी ऊपरी संरक्षण के संभव है? अगर नहीं, तो फिर इस घोटाले में और कितने चेहरे शामिल हैं? स्थानीय लोगों का गुस्सा भी अब खुलकर सामने आ रहा है। उनका कहना है कि अगर 50 रुपये के स्टाम्प से जमीन का मालिकाना बदल सकता है और नक्शे में सड़क खींची जा सकती है, तो फिर कानून और प्रक्रिया का कोई मतलब नहीं रह जाता।
प्रशासन के सामने अब यह मामला एक सीधी चुनौती बन चुका है। अगर निष्पक्ष जांच होती है, तो यह घोटाला सिर्फ एक केस नहीं रहेगा—बल्कि पूरे राजस्व तंत्र की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करेगा। लेकिन अगर इसे दबा दिया गया, तो यह साफ संदेश होगा कि कागजों में जो लिखा जाता है, वही सच मान लिया जाता है—चाहे जमीन पर कुछ भी हो।
अंत में वही सवाल गूंज रहा है—
क्या शाहिद मोहम्मद और पटवारी तंत्र पर कार्रवाई होगी, या फिर “50 रुपये के स्टाम्प से बनी सड़क” हमेशा फाइलों में ही चलती रहेगी?









