मरवाही वनमंडल में लकड़ी माफिया का आतंक: सिस्टम सोया, जंगल रोया!DFO पर बड़े सवाल,बेबस या मिलीभगत में शामिल?
करोड़ों का जंगल साफ, जिम्मेदार खामोश—आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खेल?”

मरवाही वनमंडल में सागौन का संहार: तस्करों का बोलबाला, विभाग की चुप्पी पर उठे सवाल
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही | घने जंगलों से उजड़े ठूंठ तक की कहानी कभी अपनी प्राकृतिक सुंदरता और घने सागौन-साल के जंगलों के लिए पहचाना जाने वाला मरवाही वनमंडल आज एक गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि जहां कभी हरियाली लहलहाती थी, वहां अब सिर्फ कटे हुए पेड़ों के ठूंठ नजर आ रहे हैं। सामने आई तस्वीरें और स्थानीय लोगों के आरोप यह संकेत देते हैं कि क्षेत्र में लंबे समय से संगठित तरीके से अवैध कटाई का खेल चल रहा है, जबकि वन विभाग की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

करोड़ों की लागत से तैयार प्लांटेशन का सफाया
मामला गौरेला वनपरिक्षेत्र के पंडरीपानी बीट क्रमांक 2343 का है, जहां विभाग द्वारा करोड़ों रुपये खर्च कर सागौन का प्लांटेशन किया गया था। यह प्लांटेशन भविष्य में राजस्व और पर्यावरण संरक्षण दोनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा था। लेकिन वर्तमान स्थिति चौंकाने वाली है—पेड़ों की जगह खाली जमीन और ठूंठ बचे हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की गई है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि हजारों पेड़ काट दिए गए और इसकी सूचना समय रहते विभाग को दी गई, लेकिन किसी भी स्तर पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
तस्करों के हौसले बुलंद, विभाग पर लापरवाही के आरोप
ग्रामीणों और जानकारों के मुताबिक, जिस तरह से व्यवस्थित ढंग से पेड़ों की कटाई हुई है, वह किसी छोटे स्तर की चोरी नहीं बल्कि एक संगठित गिरोह की सक्रियता को दर्शाता है। आशंका जताई जा रही है कि तस्करों ने करोड़ों रुपये की कीमती सागौन लकड़ी बाहर खपा दी है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी गतिविधि के दौरान विभागीय निगरानी कहां थी। क्या यह महज लापरवाही है या फिर इसके पीछे किसी प्रकार की मिलीभगत भी हो सकती है—यह अब जांच का विषय बन चुका है।

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले
यह पहला अवसर नहीं है जब मरवाही वनमंडल अवैध कटाई को लेकर चर्चा में आया हो। कुछ समय पहले पिपरखूँटी क्षेत्र में भी 100 से अधिक पेड़ों की कटाई का मामला सामने आया था। उस समय रायपुर से फ्लाइंग स्क्वॉड की टीम जांच के लिए पहुंची थी। हालांकि, कार्रवाई के नाम पर केवल एक बीट गार्ड को निलंबित कर दिया गया, जबकि इतने बड़े स्तर की घटना में उच्च अधिकारियों की जवाबदेही तय नहीं की गई। इस तरह की सीमित कार्रवाई से लोगों में असंतोष है और यह धारणा मजबूत हो रही है कि बड़े स्तर पर जिम्मेदारी तय करने से बचा जा रहा है।
पर्यावरणीय संतुलन पर गहराता संकट
सागौन और साल जैसे पेड़ों की अंधाधुंध कटाई का असर अब स्थानीय पर्यावरण पर स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। क्षेत्र में तापमान में वृद्धि महसूस की जा रही है और कई प्राकृतिक जल स्रोत प्रभावित हो रहे हैं। जंगलों के खत्म होने से वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहा है, जिससे वे रिहायशी इलाकों की ओर रुख कर रहे हैं। इससे मानव और वन्यजीवों के बीच टकराव की स्थिति बनने लगी है, जो भविष्य में और गंभीर रूप ले सकती है।

जवाबदेही और निष्पक्ष जांच की मांग तेज
स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि समय रहते सख्त कदम नहीं उठाए गए, तो मरवाही के जंगल पूरी तरह खत्म हो सकते हैं। लोगों की मांग है कि पूरे मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच कराई जाए, जिसमें केवल निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित न रहकर जिम्मेदार बड़े अधिकारियों की भी जवाबदेही तय की जाए। साथ ही, वन क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने और तस्करों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की जरूरत बताई जा रही है।
भविष्य के लिए चेतावनी
मरवाही वनमंडल में हो रही यह घटनाएं केवल एक क्षेत्र की समस्या नहीं हैं, बल्कि यह व्यापक स्तर पर वन संरक्षण व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर करती हैं। यदि इस पर तुरंत और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले समय में इसका असर न केवल पर्यावरण बल्कि स्थानीय जीवन और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। अब देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर मुद्दे को किस तरह से लेता है और क्या वास्तव में दोषियों के खिलाफ ठोस कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी समय के साथ ठंडे बस्ते में चला जाएगा।









