पुराने नक्शे पर रजिस्ट्री या खुलेआम फर्जीवाड़े को संरक्षण? GPM के पेंड्रारोड उप पंजीयक कार्यालय में आखिर किसके भरोसे चल रहा “दस्तावेज़ खेल”?
नियमों की अनदेखी या मिलीभगत? क्या पेंड्रारोड उप पंजीयक कार्यालय में खुलेआम हो रहा फर्जी रजिस्ट्री का खेल?

5 साल पुराने नक्शे पर रजिस्ट्री! गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले के उप पंजीयक कार्यालय पेंड्रारोड में पदस्थ रजिस्ट्रार आशुतोष अग्रवाल पर उठे सवाल,
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। जिले के उप पंजीयक कार्यालय पेंड्रारोड की कार्यप्रणाली अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। वर्ष 2021 के पुराने नक्शे के आधार पर वर्ष 2025 में जमीन की रजिस्ट्री किए जाने का मामला सामने आने के बाद पूरे पंजीयन विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। मामला अब केवल पुराने दस्तावेजों तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि बाद में नक्शे की सत्यता पर उठे सवालों ने पूरे प्रकरण को संदिग्ध बना दिया है।

जानकारी के अनुसार जिस नक्शे के आधार पर रजिस्ट्री की गई उसकी तारीख में 2021 दर्ज है, जबकि स्टाम्प और रजिस्ट्री की प्रक्रिया वर्ष 2025 में पूरी हुई। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि बाद में उक्त दस्तावेज की जांच में कथित रूप से यह सामने आया कि दस्तावेज की वैधता ही संदेह के घेरे में है। इसके बाद यह मामला सीधे फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हुई रजिस्ट्री तक पहुंच गया।
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल उप पंजीयक कार्यालय पेंड्रारोड और वहां पदस्थ रजिस्ट्रार आशुतोष अग्रवाल की भूमिका को लेकर उठ रहा है। आखिर 4–5 वर्ष पुराने नक्शे के आधार पर बिना वर्तमान रिकॉर्ड का गंभीर सत्यापन किए रजिस्ट्री कैसे कर दी गई? क्या पंजीयन कार्यालय ने वर्तमान खसरा, राजस्व नक्शा और रिकॉर्ड का मिलान किया था? या फिर केवल दस्तावेज सामने आने भर से उसे वैध मान लिया गया?

मामले में जब रजिस्ट्रार आशुतोष अग्रवाल से सवाल किया गया तो उन्होंने मौखिक रूप से यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की कोशिश की कि किसी भी नियम में यह नहीं लिखा है कि 5 साल पुराने नक्शे के आधार पर रजिस्ट्री नहीं की जा सकती। लेकिन अब यही बयान पूरे मामले का सबसे बड़ा विवाद बन गया है। क्योंकि सवाल पुराने नक्शे का नहीं बल्कि संदिग्ध और कथित फर्जी दस्तावेजों के आधार पर हुई रजिस्ट्री का है।
जिले में अब यह चर्चा तेज हो गई है कि पेंड्रारोड उप पंजीयक कार्यालय में दस्तावेजों की गंभीर जांच के बजाय केवल रजिस्ट्री प्रक्रिया पूरी कराने पर जोर दिया जा रहा है। यदि वर्षों पुराने और विवादित दस्तावेज भी बिना रोक-टोक स्वीकार हो रहे हैं, तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि पूरे सिस्टम की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

कानूनी जानकारों का भी मानना है कि Registration Act, 1908 के तहत पंजीयन अधिकारी केवल औपचारिक मुहर लगाने वाला कर्मचारी नहीं होता। उसे प्रस्तुत दस्तावेजों की prima facie वैधता, रिकॉर्ड की स्थिति और संदेहास्पद परिस्थितियों का परीक्षण करना होता है। ऐसे में यदि कथित फर्जी नक्शों और संदिग्ध दस्तावेजों के आधार पर रजिस्ट्री हो रही है, तो जिम्मेदारी से पूरी तरह बचना आसान नहीं माना जा सकता।
पूरा मामला अब जिले में भारी चर्चा और आक्रोश का विषय बन चुका है। लोगों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि आखिर पेंड्रारोड उप पंजीयक कार्यालय में यह सब किसके संरक्षण में चल रहा है। यदि समय रहते ऐसे मामलों पर कठोर कार्रवाई नहीं हुई, तो आने वाले समय में फर्जी रजिस्ट्री और जमीन घोटालों का बड़ा नेटवर्क सामने आ सकता है। अब निगाहें जिला प्रशासन और उच्च पंजीयन अधिकारियों पर टिकी हैं कि वे इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदारों पर कार्रवाई करते हैं या नहीं।









